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Rigveda Mandal 6 / Sukta 15 / Mantra 5

75 Sukta
19 Mantra
6/15/5
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
पा॒व॒कया॒ यश्चि॒तय॑न्त्या कृ॒पा क्षाम॑न्रुरु॒च उ॒षसो॒ न भा॒नुना॑। तूर्व॒न्न याम॒न्नेत॑शस्य॒ नू रण॒ आ यो घृ॒णे न त॑तृषा॒णो अ॒जरः॑ ॥५॥

पा॒व॒कया॑ । यः । चि॒तय॑न्त्या । कृ॒पा । क्षाम॑न् । रु॒रु॒चे । उ॒षसः॑ । न । भा॒नुना॑ । तूर्व॑न् । न । याम॑न् । एत॑शस्य । नु । रणे॑ । यः । घृ॒णे । न । त॒तृषा॒णः । अ॒जरः॑ ॥

Mantra without Swara
पावकया यश्चितयन्त्या कृपा क्षामन्रुरुच उषसो न भानुना। तूर्वन्न यामन्नेतशस्य नू रण आ यो घृणे न ततृषाणो अजरः ॥

पावकया। यः। चितयन्त्या। कृपा। क्षामन्। रुरुचे। उषसः। न। भानुना। तूर्वन्। न। यामन्। एतशस्य। नु। रणे। यः। घृणे। न। ततृषाणः। अजरः ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 17 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (भानुना) किरण से (उषसः) प्रभातवेला (न) जैसे वैसे (पावकया) अग्नि की क्रिया से और (चितयन्त्या) जनाती हुई (कृपा) कृपा से (क्षामन्) पृथिवी में (रुरुचे) प्रकाशित किया जाता है (घृणे) प्रदीप्त में (न) जैसे वैसे (रणे) संग्राम में (ततृषाणः) पिपासा से व्याकुल (अजरः) जरा से रहित (यः) जो (यामन्) चलते हैं जिसमें उस मार्ग में (एतशस्य) घोड़े का चलानेवाला (तूर्वन्) हिंसन करता हुआ (न) जैसे वैसे (नू) शीघ्र (आ) प्रकाशित होता है, वह सेवा करने योग्य है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य के किरण प्रातःकाल को प्रकाशित करते हैं, वैसे ही विद्वान् जन सब के अन्तः करणों को प्रकाशित करें ॥५॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या प्रकाशित करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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