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Rigveda Mandal 6 / Sukta 15 / Mantra 4

75 Sukta
19 Mantra
6/15/4
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
द्यु॒ता॒नं वो॒ अति॑थिं॒ स्व॑र्णरम॒ग्निं होता॑रं॒ मनु॑षः स्वध्व॒रम्। विप्रं॒ न द्यु॒क्षव॑चसं सुवृ॒क्तिभि॑र्हव्य॒वाह॑मर॒तिं दे॒वमृ॑ञ्जसे ॥

द्यु॒ता॒नम् । वः॒ । अति॑थिम् । स्वः॑ऽनरम् । अ॒ग्निम् । होता॑रम् । मनु॑षः । सु॒ऽअ॒ध्व॒रम् । विप्र॑म् । न । द्यु॒क्षऽव॑चसम् । सु॒वृ॒क्तिऽभिः॑ । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । अ॒र॒तिम् । दे॒वम् । ऋ॒ञ्ज॒से॒ ॥

Mantra without Swara
द्युतानं वो अतिथिं स्वर्णरमग्निं होतारं मनुषः स्वध्वरम्। विप्रं न द्युक्षवचसं सुवृक्तिभिर्हव्यवाहमरतिं देवमृञ्जसे ॥

द्युतानम्। वः। अतिथिम्। स्वःऽनरम्। अग्निम्। होतारम्। मनुषः। सुऽअध्वरम्। विप्रम्। न। द्युक्षऽवचसम्। सुवृक्तिऽभिः। हव्यऽवाहम्। अरतिम्। देवम्। ऋञ्जसे ॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 17 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! जो आप (वः) आप लोगों के (अतिथिम्) अतिथि के समान (द्युतानम्) सत्यार्थ के प्रकाशक (स्वर्णरम्) सुख को प्राप्त कराने और (मनुषः) मनुष्य के (होतारम्) ग्रहण करनेवाले (स्वध्वरम्) उत्तम प्रकार यज्ञ जिससे उस (अग्निम्) अग्नि को (सुवृक्तिभिः) अच्छे प्रकार चलते हैं जिन क्रियाओं से उनके सहित जैसे वैसे (द्युक्षवचसम्) द्योतकवचन के प्रकाशक (हव्यवाहम्) धारण करने योग्य को वहन करने और (अरतिम्) प्राप्ति करानेवाले (देवम्) प्रकाशमान (विप्रम्) बुद्धिमान् को (न) जैसे वैसे (ऋञ्जसे) सिद्ध करते हो उसका हम लोग सत्कार करें ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे बुद्धिमान् जन यथायोग्य कर्म्मों को करने को समर्थ होता है, वैसे ही युक्ति से अच्छे प्रकार प्रयोग किया अग्नि सम्पूर्ण व्यापार सिद्ध करने को समर्थ होता है ॥४॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥