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Rigveda Mandal 6 / Sukta 15 / Mantra 2

75 Sukta
19 Mantra
6/15/2
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
मि॒त्रं न यं सुधि॑तं॒ भृग॑वो द॒धुर्वन॒स्पता॒वीड्य॑मू॒र्ध्वशो॑चिषम्। स त्वं सुप्री॑तो वी॒तह॑व्ये अद्भुत॒ प्रश॑स्तिभिर्महयसे दि॒वेदि॑वे ॥२॥

मि॒त्रम् । न । यम् । सु॒ऽधि॑तम् । भृग॑वः । द॒धुः । वन॒स्पतौ॑ । ईड्य॑म् । ऊ॒र्ध्वऽशो॑चिषम् । सः । त्वम् । सुऽप्री॑तः । वी॒तऽह॑व्ये । अ॒द्भु॒त॒ । प्रश॑स्तिऽभिः । म॒ह॒य॒से॒ । दि॒वेऽदि॑वे ॥

Mantra without Swara
मित्रं न यं सुधितं भृगवो दधुर्वनस्पतावीड्यमूर्ध्वशोचिषम्। स त्वं सुप्रीतो वीतहव्ये अद्भुत प्रशस्तिभिर्महयसे दिवेदिवे ॥

मित्रम्। न। यम्। सुऽधितम्। भृगवः। दधुः। वनस्पतौ। ईड्यम्। ऊर्ध्वऽशोचिषम्। सः। त्वम्। सुऽप्रीतः। वीतऽहव्ये। अद्भुत। प्रशस्तिऽभिः। महयसे। दिवेऽदिवे ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 17 Mantra » 2

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Meaning
हे (अद्भुत) महाशय ! (यम्) जिस (मित्रम्) मित्र को (न) जैसे वैसे (सुधितम्) उत्तम प्रकार स्थित को (वनस्पतौ) किरणों के पालक सूर्य्य में (ईड्यम्) उत्तम गुणों से प्रशंसा करने योग्य (ऊर्ध्वशोचिषम्) ऊपर को ज्वाला जिसकी उसको (भृगवः) विद्वान् मनुष्य (दधुः) धारण करते हैं (सः) वह (त्वम्) आप (प्रशस्तिभिः) प्रशंसा करने योग्य धर्म्मयुक्त क्रियाओं से (दिवेदिवे) प्रतिदिन (सुप्रीतः) उत्तम प्रकार प्रसन्न हुए (वीतहव्ये) व्याप्त हुआ ग्रहण करने योग्य वस्तु जिससे उसमें (महयसे) सत्कार किये जाते हो, इससे सेवन करने योग्य हो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे मित्र कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही अग्नि उत्तम प्रकार प्रयोग किया कार्य्यों को सिद्ध करता है ॥२॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥