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Rigveda Mandal 6 / Sukta 15 / Mantra 18

75 Sukta
19 Mantra
6/15/18
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
जनि॑ष्वा दे॒ववी॑तये स॒र्वता॑ता स्व॒स्तये॑। आ दे॒वान् व॑क्ष्य॒मृताँ॑ ऋता॒वृधो॑ य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ पिस्पृशः ॥१८॥

जनि॑ष्व । दे॒वऽवी॑तये । स॒र्वऽता॑ता । स्व॒स्तये॑ । आ । दे॒वान् । व॒क्षि॒ । अ॒मृता॑न् । ऋ॒त॒ऽवृधः॑ । य॒ज्ञम् । दे॒वेषु॑ । पि॒स्पृ॒शः॒ ॥

Mantra without Swara
जनिष्वा देववीतये सर्वताता स्वस्तये। आ देवान् वक्ष्यमृताँ ऋतावृधो यज्ञं देवेषु पिस्पृशः ॥

जनिष्व। देवऽवीतये। सर्वऽताता। स्वस्तये। आ। देवान्। वक्षि। अमृतान्। ऋतऽवृधः। यज्ञम्। देवेषु। पिस्पृशः ॥१८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 20 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वन् ! आप (देववीतये) श्रेष्ठ गुणों की प्राप्ति के लिये और (स्वस्तये) सुख की प्राप्ति के लिये (सर्वताता) सम्पूर्ण सुख के करनेवाले शिल्प=कारीगरीरूप यज्ञ में (अमृतान्) नाशरहित (ऋतावृधः) सत्यव्यवहार के बढ़ानेवाले (देवान्) श्रेष्ठ गुणों वा भोगों को (आ, वक्षि) प्राप्त कराइये और (देवेषु) विद्वानों में (यज्ञम्) सुख के देनेवाले यज्ञ का (पिस्पृशः) स्पर्श कराइये, इससे सुखों को (जनिष्वा) प्रकट कीजिये ॥१८॥
Essence
विद्वानों को चाहिये कि सृष्टि में वर्त्तमान पदार्थों से विद्या के द्वारा श्रेष्ठ भोगों को प्राप्त होकर अपने लिये अनेक प्रकार के सुख को उत्पन्न करें ॥१८॥
Subject
मनुष्यों को सृष्टि से कौन-कौन उपकार ग्रहण करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥