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Rigveda Mandal 6 / Sukta 15 / Mantra 16

75 Sukta
19 Mantra
6/15/16
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग्ने॒ विश्वे॑भिः स्वनीक दे॒वैरूर्णा॑वन्तं प्रथ॒मः सी॑द॒ योनि॑म्। कु॒ला॒यिनं॑ घृ॒तव॑न्तं सवि॒त्रे य॒ज्ञं न॑य॒ यज॑मानाय सा॒धु ॥१६॥

अग्ने॑ । विश्वे॑भिः । सु॒ऽअ॒नी॒क॒ । दे॒वैः । ऊर्णा॑ऽवन्तम् । प्र॒थ॒मः । सी॒द॒ । योनि॑म् । कु॒ला॒यिन॑म् । घृ॒तऽव॑न्तम् । स॒वि॒त्रे । य॒ज्ञम् । न॒य॒ । यज॑मानाय । सा॒धु ॥

Mantra without Swara
अग्ने विश्वेभिः स्वनीक देवैरूर्णावन्तं प्रथमः सीद योनिम्। कुलायिनं घृतवन्तं सवित्रे यज्ञं नय यजमानाय साधु ॥

अग्ने। विश्वेभिः। सुऽअनीक। देवैः। ऊर्णाऽवन्तम्। प्रथमः। सीद। योनिम्। कुलायिनम्। घृतऽवन्तम्। सवित्रे। यज्ञम्। नय। यजमानाय। साधु ॥१६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 20 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (स्वनीक) सुन्दर सेनावाले (अग्ने) विद्वन् राजन् ! (प्रथमः) प्रसिद्ध आप (विश्वेभिः) सम्पूर्ण (देवैः) विद्वानों वा वीर पुरुषों के साथ (ऊर्णावन्तम्) बहुत ऊर्णा के वस्त्रों से युक्त (योनिम्) गृह में (सीद) वर्त्तमान हो (सवित्रे) संसार को उत्पन्न करने और (यजमानाय) पदार्थों के मिलानेरूप विद्या को जाननेवाले के लिये (कुलायिनम्) गृह आदि सामग्री से और (घृतवन्तम्) बहुत घृत आदि पदार्थों से युक्त (यज्ञम्) सङ्गतिस्वरूप व्यवहार को साधु उत्तम प्रकार (नय) प्राप्त कराइये ॥१६॥
Essence
हे विद्यायुक्त राजजनो ! आप लोग विद्वानों के सहाय से न्याय के गृहों में ठहर के न्याय करिये और सब मनुष्यों को न्यायमार्ग पर चलाइये, जिससे सब श्रेष्ठ मार्ग में स्थित होकर परोपकारी होवें ॥१६॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥