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Rigveda Mandal 6 / Sukta 15 / Mantra 14

75 Sukta
19 Mantra
6/15/14
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग्ने॒ यद॒द्य वि॒शो अ॑ध्वरस्य होतः॒ पाव॑कशोचे॒ वेष्ट्वं हि यज्वा॑। ऋ॒ता य॑जासि महि॒ना वि यद्भूर्ह॒व्या व॑ह यविष्ठ॒ या ते॑ अ॒द्य ॥१४॥

अग्ने॑ । यत् । अ॒द्य । वि॒शः । अ॒ध्व॒र॒स्य॒ । हो॒त॒रिति॑ । पाव॑कऽशोचे । वेः । त्वम् । हि । यज्वा॑ । ऋ॒ता । य॒जा॒सि॒ । म॒हि॒ना । वि । यत् । भूः । ह॒व्या । व॒ह॒ । य॒वि॒ष्ठ॒ । या । ते॒ । अ॒द्य ॥

Mantra without Swara
अग्ने यदद्य विशो अध्वरस्य होतः पावकशोचे वेष्ट्वं हि यज्वा। ऋता यजासि महिना वि यद्भूर्हव्या वह यविष्ठ या ते अद्य ॥

अग्ने। यत्। अद्य। विशः। अध्वरस्य। होतरिति। पावकऽशोचे। वेः। त्वम्। हि। यज्वा। ऋता। यजासि। महिना। वि। यत्। भूः। हव्या। वह। यविष्ठ। या। ते। अद्य ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 19 Mantra » 4

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Meaning
हे (पावकशोचे) पवित्र प्रकाश और (होतः) दान करने तथा (यविष्ठ) अतिशय मिलाने वा विभाग कराने और (अग्ने) सम्पूर्ण प्रजा की पीड़ाओं के दूर करनेवाले (यत्) जो (यज्वा) मेल करनेवाले (त्वम्) आप (हि) निश्चय से (अद्य) इस समय (विशः) मनुष्य आदि प्रजा के (वेः) आकाशगन्ता पक्षी के समान (अध्वरस्य) अहिंसामय के (ऋता) सत्य सुख के प्राप्त करानेवाले यज्ञ में (यजासि) यजन करते हो (यत्) जो आप (महिना) महत्त्व से (वि) विशेष करके (भूः) होवें और (या) जो वस्तुएँ (ते) आपके वर्त्तमान में (अद्य) इस समय हैं, उन (हव्या) देने योग्यों को हम लोगों के लिये (वह) प्राप्त करिये ॥१४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो सम्पूर्ण सृष्टि को एकत्रित करता है और जो व्यापक अहिंसा आदि धर्म्म के अनुष्ठान के लिये आज्ञा देता है, वह ही सब से उपासना करने योग्य है ॥१४॥
Subject
फिर वह जगदीश्वर कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥

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