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Rigveda Mandal 6 / Sukta 15 / Mantra 10

75 Sukta
19 Mantra
6/15/10
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तं सु॒प्रती॑कं सु॒दृशं॒ स्वञ्च॒मवि॑द्वांसो वि॒दुष्ट॑रं सपेम। स य॑क्ष॒द् विश्वा॑ व॒युना॑नि वि॒द्वान्प्र ह॒व्यम॒ग्निर॒मृते॑षु वोचत् ॥१०॥

तम् । सु॒ऽप्रती॑कम् । सु॒ऽदृश॑म् । सु॒ऽअञ्च॑म् । अवि॑द्वांसः । वि॒दुःऽत॑रम् । स॒पे॒म॒ । सः । य॒क्ष॒त् । विश्वा॑ । व॒युना॑नि । वि॒द्वान् । प्र । ह॒व्यम् । अ॒ग्निः । अ॒मृते॑षु । वो॒च॒त् ॥

Mantra without Swara
तं सुप्रतीकं सुदृशं स्वञ्चमविद्वांसो विदुष्टरं सपेम। स यक्षद् विश्वा वयुनानि विद्वान्प्र हव्यमग्निरमृतेषु वोचत् ॥

तम्। सुऽप्रतीकम्। सुऽदृशम्। सुऽअञ्चम्। अविद्वांसः। विदुःऽतरम्। सपेम। सः। यक्षत्। विश्वा। वयुनानि। विद्वान्। प्र। हव्यम्। अग्निः। अमृतेषु। वोचत् ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 18 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अविद्वांसः) विद्या से रहित जन (तम्) उस (सुप्रतीकम्) सुन्दर कर्म्म किये जिसने तथा (सुदृशम्) योगाभ्यास से देखने योग्य वा उत्तम प्रकार दिखाने और (स्वञ्चम्) अच्छे प्रकार जानने वा प्राप्त करानेवाले (विदुष्टरम्) अत्यन्त विद्वान् ईश्वर को नहीं विशेष करके जानते और न उपासना करते हैं, उनको हम लोग (सपेम) शाप देते हैं और जो (विद्वान्) प्रकट विद्याओं से युक्त (अग्निः) अग्नि के समान स्वयंप्रकाशित हुआ (विश्वा) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञानों और (अमृतेषु) नाशरहित कारण जीवों में (हव्यम्) देने योग्य विज्ञान को (प्र, वोचत्) अत्यन्त कहता है (सः) वह हम लोगों को (यक्षत्) प्राप्त करावे ॥१०॥
Essence
जो परमात्मा को नहीं जानते और उसकी आज्ञा के अनुकूल आचरण नहीं करते हैं, उनको धिक् है धिक् है और जो उसकी उपासना करते हैं, वे धन्य हैं। और जो हम लोगों के लिये वेदद्वारा सम्पूर्ण विज्ञानों का उपदेश देता है, उसी की हम सब लोग उपासना करें ॥१०॥
Subject
फिर उसका ज्ञान और उपासना आवश्यक है, इस विषय को कहते हैं ॥