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Rigveda Mandal 6 / Sukta 15 / Mantra 1

75 Sukta
19 Mantra
6/15/1
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
इ॒ममू॒ षु वो॒ अति॑थिमुष॒र्बुधं॒ विश्वा॑सां वि॒शां पति॑मृञ्जसे गि॒रा। वेतीद्दि॒वो ज॒नुषा॒ कच्चि॒दा शुचि॒र्ज्योक्चि॑दत्ति॒ गर्भो॒ यदच्यु॑तम् ॥१॥

इ॒मम् । ऊँ॒ इति॑ । सु । वः॒ । अति॑थिम् । उ॒षः॒ऽबुध॑म् । विश्वा॑साम् । वि॒शाम् । पति॑म् । ऋ॒ञ्ज॒से॒ । गि॒रा । वेति॑ । इत् । दि॒वः । ज॒नुषा॑ । कत् । चि॒त् । आ । शुचिः॑ । ज्योक् । चि॒त् । अ॒त्ति॒ । गर्भः॑ । यत् । अच्यु॑तम् ॥

Mantra without Swara
इममू षु वो अतिथिमुषर्बुधं विश्वासां विशां पतिमृञ्जसे गिरा। वेतीद्दिवो जनुषा कच्चिदा शुचिर्ज्योक्चिदत्ति गर्भो यदच्युतम् ॥

इमम्। ऊँ इति। सु। वः। अतिथिम्। उषःऽबुधम्। विश्वासाम्। विशाम्। पतिम्। ऋञ्जसे। गिरा। वेति। इत्। दिवः। जनुषा। कत्। चित्। आ। शुचिः। ज्योक्। चित्। अत्ति। गर्भः। यत्। अच्युतम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 17 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! जिस कारण से आप (इमम्) इस (विश्वासाम्) सम्पूर्ण (विशाम्) मनुष्य आदि प्रजाओं के (पतिम्) पालक (अतिथिम्) अतिथि के समान वर्त्तमान (उषर्बुधम्) प्रातःकाल में जगानेवाले को (ऋञ्जसे) सिद्ध करते हैं (गर्भः) अन्तःस्थ के समान जो (उ) तर्कनासहित (दिवः) पदार्थबोध की (जनुषा) उत्पत्ति से (सु, वेति) अच्छे प्रकार व्याप्त होता (इत्) ही है तथा (कत्) कभी (चित्) भी (यत्) जो (शुचिः) पवित्र (अच्युतम्) नाश से रहित वस्तु को (ज्योक्) निरन्तर (अत्ति) भोगता है और (वः) आप लोगों की (गिरा) वाणी से (चित्) निश्चित (आ) आज्ञा करता है, वह विद्वान् होता है ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे अतिथि सत्कार करने योग्य है, वैसे ही पदार्थविद्या का जाननेवाला सत्कार करने योग्य है, जो सब के अन्तःस्थ नित्य बिजुली की ज्योति को जानते हैं, वे अभीप्सित सुख को प्राप्त होते हैं ॥१॥
Subject
अब उन्नीस ऋचावाले सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अब मनुष्यों को क्या जानना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥