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Rigveda Mandal 6 / Sukta 14 / Mantra 5

75 Sukta
6 Mantra
6/14/5
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्हि वि॒द्मना॑ नि॒दो दे॒वो मर्त॑मुरु॒ष्यति॑। स॒हावा॒ यस्यावृ॑तो र॒यिर्वाजे॒ष्ववृ॑तः ॥५॥

अ॒ग्निः । हि । वि॒द्मना॑ । नि॒दः । दे॒वः । मर्त॑म् । उ॒रु॒ष्यति॑ । स॒हऽवा॑ । यस्य॑ । अवृ॑तः । र॒यिः । वाजे॑षु । अवृ॑तः ॥

Mantra without Swara
अग्निर्हि विद्मना निदो देवो मर्तमुरुष्यति। सहावा यस्यावृतो रयिर्वाजेष्ववृतः ॥

अग्निः। हि। विद्मना। निदः। देवः। मर्तम्। उरुष्यति। सहऽवा। यस्य। अवृतः। रयिः। वाजेषु। अवृतः ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 16 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अवृतः) नहीं स्वीकार किया गया (सहावा) सहनेवाला (देवः) निरन्तर प्रकाशमान (अग्निः) अग्नि के सदृश पवित्रों से बढ़ा हुआ मुनि (मर्त्तम्) मनुष्य को (उरुष्यति) सेवता है उसको (हि) जिससे (विद्मना) ज्ञान से विशेष करके जानें और (यस्य) जिसके (वाजेषु) सङ्ग्रामों में (अवृतः) नहीं आच्छादित किया गया (रयिः) धन होता है, उससे (निदः) निन्दा करनेवालों का निवारण कीजिये ॥५॥
Essence
सब पदार्थों को उत्पन्न करती हुई बिजुली को मनुष्य जानें, जिस विज्ञान से आग्नेयादि नामक अस्त्र सिद्ध होते हैं, उसका सब काल में खोज करो ॥५॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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