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Rigveda Mandal 6 / Sukta 13 / Mantra 4

75 Sukta
6 Mantra
6/13/4
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्ते॑ सूनो सहसो गी॒र्भिरु॒क्थैर्य॒ज्ञैर्मर्तो॒ निशि॑तिं वे॒द्यान॑ट्। विश्वं॒ स दे॑व॒ प्रति॒ वार॑मग्ने ध॒त्ते धा॒न्यं१॒॑ पत्य॑ते वस॒व्यैः॑ ॥४॥

यः । ते॒ । सू॒नो॒ इति॑ । स॒ह॒सः॒ । गीः॒ऽभिः । उ॒क्थैः । य॒ज्ञैः । मर्तः॑ । निऽशि॑तम् । वे॒द्या । आन॑ट् । विश्व॑म् । सः । दे॒व॒ । प्रति॑ । वार॑म् । अ॒ग्ने॒ । ध॒त्ते । धा॒न्यम् । पत्य॑ते । व॒स॒व्यैः॑ ॥

Mantra without Swara
यस्ते सूनो सहसो गीर्भिरुक्थैर्यज्ञैर्मर्तो निशितिं वेद्यानट्। विश्वं स देव प्रति वारमग्ने धत्ते धान्यं१ पत्यते वसव्यैः ॥

यः। ते। सूनो इति। सहसः। गीःऽभिः। उक्थैः। यज्ञैः। मर्तः। निऽशितम्। वेद्या। आनट्। विश्वम्। सः। देव। प्रति। वारम्। अग्ने। धत्ते। धान्यम्। पत्यते। वसव्यैः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 15 Mantra » 4

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Meaning
हे (सहसः) बलिष्ठ के (सूनोः) पुत्र (देव) दीप्तिमान् (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान विद्वन् ! (ते) आप का (यः) जो (मर्त्तः) मनुष्य (गीर्भिः) वाणियों और (उक्थैः) कहने और जानने योग्य वेद के वचनों से और (वेद्या) सुख को प्राप्त करानेवाली वेदी से (निशितिम्) निरन्तर तीक्ष्णता के साथ (आनट्) व्याप्त होता है (वसव्यैः) धनों में प्रकट हुए पदार्थों के साथ (यज्ञैः) विद्वानों के सत्कारादिकों से (विश्वम्) समग्र पदार्थ को (धान्यम्) धान्य को (वा) वा (अरम्) पूर्ण (प्रति, धत्ते) धारण करता और (पत्यते) स्वामी के सदृश आचरण करता है (सः) वह आप से मेल करने योग्य है ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! पूर्ण ब्रह्मचर्य्य से शरीर और आत्मा के बल को पूर्ण करके सन्तानों की उत्पत्ति करो ॥४॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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