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Rigveda Mandal 6 / Sukta 13 / Mantra 2

75 Sukta
6 Mantra
6/13/2
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं भगो॑ न॒ आ हि रत्न॑मि॒षे परि॑ज्मेव क्षयसि द॒स्मव॑र्चाः। अग्ने॑ मि॒त्रो न बृ॑ह॒त ऋ॒तस्याऽसि॑ क्ष॒त्ता वा॒मस्य॑ देव॒ भूरेः॑ ॥२॥

त्वम् । भगः॑ । नः॒ । आ । हि । रत्न॑म् । इ॒षे । परि॑ज्माऽइव । क्ष॒य॒सि॒ । द॒स्मऽव॑र्चाः । अग्ने॑ । मि॒त्रः । न । बृ॒ह॒तः । ऋ॒तस्य । असि॑ । क्ष॒त्ता । वा॒मस्य॑ । दे॒व॒ । भूरेः॑ ॥

Mantra without Swara
त्वं भगो न आ हि रत्नमिषे परिज्मेव क्षयसि दस्मवर्चाः। अग्ने मित्रो न बृहत ऋतस्याऽसि क्षत्ता वामस्य देव भूरेः ॥

त्वम्। भगः। नः। आ। हि। रत्नम्। इषे। परिज्माऽइव। क्षयसि। दस्मऽवर्चाः। अग्ने। मित्रः। न। बृहतः। ऋतस्य। असि। क्षत्ता। वामस्य। देव। भूरेः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 15 Mantra » 2

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Meaning
हे (देव) देनेवाले (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान विद्वन् ! जिस कारण से (त्वम्) आप (मित्रः) (न) जैसे वैसे (बृहतः) बड़े (वामस्य) श्रेष्ठ (भूरेः) बहुत (ऋतस्य) सत्य वा जल के (क्षत्ता) छेदक (असि) हैं, इस कारण से (दस्मवर्चाः) उपक्षयित अर्थात् निवास कराई वा निवास की कान्ति जिन्होंने तथा (परिज्मेव) जो सब ओर से चलनेवाले वायु के सदृश (भगः) सेवन करने योग्य ऐश्वर्य्य जिनका ऐसे हुए (नः) हम लोगों को (हि) जिस कारण से (रत्नम्) धन को (इषे) प्राप्त होने को (आ) सब ओर से (क्षयसि) निवास करते वा निवास कराते हो, इस कारण आदर करने योग्य हो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन प्राणों के सदृश धन और ऐश्वर्य्य की शोभा को धारण करते हैं, वे मित्र के सदृश वर्त्ताव करके सब को सुखी करें ॥२॥
Subject
फिर विद्वानों को इस संसार में कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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