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Rigveda Mandal 6 / Sukta 12 / Mantra 6

75 Sukta
6 Mantra
6/12/6
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स त्वं नो॑ अर्व॒न्निदा॑या॒ विश्वे॑भिरग्ने अ॒ग्निभि॑रिधा॒नः। वेषि॑ रा॒यो वि या॑सि दु॒च्छुना॒ मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑ ॥६॥

सः । त्वम् । नः॒ । अ॒र्व॒न् । निदा॑याः । विश्वे॑भिः । अ॒ग्ने॒ । अ॒ग्निऽभिः॑ । इ॒धा॒नः । मदे॑म । श॒तऽहि॑माः । सु॒ऽवीराः॑ ॥

Mantra without Swara
स त्वं नो अर्वन्निदाया विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिधानः। वेषि रायो वि यासि दुच्छुना मदेम शतहिमाः सुवीराः ॥

सः। त्वम्। नः। अर्वन्। निदायाः। विश्वेभिः। अग्ने। अग्निऽभिः। इधानः। वेषि। रायः। वि। यासि। दुच्छुनाः। मदेम। शतऽहिमाः। सुऽवीराः ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अर्वन्) घोड़े की सदृश शीघ्र चलाते हुए (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रतापी जिस कारण से (त्वम्) आप (विश्वेभिः) सम्पूर्ण (अग्निभिः) बिजुली आदिकों से (इधानः) निरन्तर प्रकाशमान (नः) हम लोगों की (निदायाः) निन्दा करते हुए प्रजाजन के (रायः) धनों को (वेषि) व्याप्त होते हो और (दुच्छुनाः) दुष्ट श्वा के सदृश वर्त्तमान सेनाओं को (वि, यासि) विशेष प्राप्त होते हो (सः) वह आप और हम लोग (शतहिमाः) सौ हिम वर्ष जिनके वे (सुवीराः) सुन्दर वीर जन (मदेम) हर्षित होवें ॥६॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि सम्पूर्ण अग्नि आदि पदार्थों से कार्य्यों को सिद्ध करके जो न्याय की आज्ञा से विरुद्ध प्रजाजन हैं, उनको ताड़न करके शान्त सम्पादित करें, क्योंकि इस प्रकार न्याय के आचरण से सम्पूर्ण जन सौ वर्ष युक्त होते हैं ॥६॥ इस सूक्त में विद्वान्, राजा और प्रजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह बारहवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर मनुष्य कैसे होवें, इस विषय को कहते हैं ॥