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Rigveda Mandal 6 / Sukta 12 / Mantra 5

75 Sukta
6 Mantra
6/12/5
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अध॑ स्मास्य पनयन्ति॒ भासो॒ वृथा॒ यत्तक्ष॑दनु॒याति॑ पृ॒थ्वीम्। स॒द्यो यः स्य॒न्द्रो विषि॑तो॒ धवी॑यानृ॒णो न ता॒युरति॒ धन्वा॑ राट् ॥५॥

अध॑ । स्म॒ । अ॒स्य॒ । प॒न॒य॒न्ति॒ । भासः॑ । वृथा॑ । यत् । तक्ष॑त् । अ॒नु॒ऽयाति॑ । पृ॒थ्वीम् । स॒द्यः । यः । स्प॒न्द्रः । विऽसि॑तः । धवी॑यान् । ऋ॒णः । न । ता॒युः । अति॑ । धन्व॑ । राट् ॥

Mantra without Swara
अध स्मास्य पनयन्ति भासो वृथा यत्तक्षदनुयाति पृथ्वीम्। सद्यो यः स्यन्द्रो विषितो धवीयानृणो न तायुरति धन्वा राट् ॥

अध। स्म। अस्य। पनयन्ति। भासः। वृथा। यत्। तक्षत्। अनुऽयाति। पृथ्वीम्। सद्यः। यः। स्यन्द्रः। विऽसितः। धवीयान्। ऋणः। न। तायुः। अति। धन्व। राट् ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 5

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Meaning
हे विद्वान् जनो ! (यः) जो (स्यन्द्रः) बहानेवाला (विषितः) व्याप्त (धवीयान्) अतिशय कम्पाने और (वृथा) व्यर्थ (ऋणः) प्राप्त करानेवाला (तायुः) चोर (न) जैसे वैसे वर्त्तमान अग्नि (यत्) जिन (भासः) प्रकाशों को (तक्षत्) सूक्ष्म करता है (पृथ्वीम्) पृथिवी के (सद्यः) शीघ्र (अनुयाति) पीछे चलता है (अध) इसके अनन्तर (स्म) ही (अस्य) इस राजा के गुणों की विद्वान् जन (पनयन्ति) स्तुति करते हैं, उसको जान कर और उसकी विद्या को प्राप्त होकर (राट्) राजा (अति, धन्वा) धनुर्वेद का अत्यन्त जाननेवाला होता है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो ! जो आप लोग बिजुली की विद्या को जानकर यन्त्रों से घर्षित कर इस को उत्पन्न करके इस बिजुली के साथ मनुष्य आदिकों को युक्त करें तो यह अति कम्पानेवाली और वेगवती होवे और स्वच्छ काच के स्वभ्र पट्टे के अन्तर्गत मनुष्य को अलग करावें तो यह बिजुली शीघ्र भूमि में प्राप्त होती हैं, सो यह सर्वत्र व्याप्त और प्रशंसा करने योग्य गुणवाली है, जिससे राजा लोग शत्रुओं को सहज से जीतकर धनवान् होते हैं ॥५॥
Subject
अब कैसी बिजुली है, इस विषय को कहते हैं ॥

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