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Rigveda Mandal 6 / Sukta 12 / Mantra 4

75 Sukta
6 Mantra
6/12/4
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सास्माके॑भिरे॒तरी॒ न शू॒षैर॒ग्निः ष्ट॑वे॒ दम॒ आ जा॒तवे॑दाः। द्र्व॑न्नो व॒न्वन् क्रत्वा॒ नार्वो॒स्रः पि॒तेव॑ जार॒यायि॑ य॒ज्ञैः ॥४॥

सः । अ॒स्माके॑भिः । ए॒तरि॑ । न । शू॒षैः । अ॒ग्निः । स्त॒वे॒ । दमे॑ । आ । जा॒तऽवे॑दाः । द्रुऽअ॑न्नः । व॒न्वन् । क्रत्वा॑ । न । अर्वा॑ । उ॒स्रः । पि॒ताऽइ॑व । जा॒र॒यायि॑ । य॒ज्ञैः ॥

Mantra without Swara
सास्माकेभिरेतरी न शूषैरग्निः ष्टवे दम आ जातवेदाः। द्र्वन्नो वन्वन् क्रत्वा नार्वोस्रः पितेव जारयायि यज्ञैः ॥

सः। अस्माकेभिः। एतरि। न। शूषैः। अग्निः। स्तवे। दमे। आ। जातऽवेदाः। द्रुऽअन्नः। वन्वन्। क्रत्वा। न। अर्वा। उस्रः। पिताऽइव। जारयायि। यज्ञैः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (अस्माकेभिः) हम लोगों के साथ (द्र्वन्नः) द्रवीभूत अन्न जिससे वह (जारयायि) वृद्धावस्था को प्राप्त होने का स्वभाव जिसका उस शरीर का (वन्वन्) सेवन करता हुआ (पितेव) जैसे पिता, वैसे (अर्वा) घोड़ा (न) जैसे वैसे (क्रत्वा) बुद्धि वा कर्म्म से (उस्रः) गौओं का सेवन करता है, वैसे (यज्ञैः) विद्वानों की सेवा आदि (शूषैः) बल आदिकों के साथ (अग्निः) अग्नि के समान (जातवेदाः) प्रकट हुओं को जाननेवाला (स्तवे) प्रशंसा करने योग्य (दमे) गृह में और (एतरी) प्राप्त होने योग्य में (न) जैसे वैसे (आ) प्राप्त होता है (सः) वह राजा हम लोगों से सेवन करने योग्य है ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे प्रशंसा करने योग्य गृह में सुख से निवास होता है, वैसे ही पिता के सदृश पालन करनेवाले राजा के होने पर प्रजा सुखपूर्वक निवास करती है और जैसे बुद्धि से जितेन्द्रिय होकर और पृथिवी के राज्य को प्राप्त होकर अनाथों की रक्षा करता है, वैसे ही विद्वानों को चाहिये कि सत्य उपदेश से सब जगत् की रक्षा करें ॥४॥
Subject
फिर विद्वानों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥