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Rigveda Mandal 6 / Sukta 12 / Mantra 3

75 Sukta
6 Mantra
6/12/3
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तेजि॑ष्ठा॒ यस्या॑र॒तिर्व॑ने॒राट् तो॒दो अध्व॒न्न वृ॑धसा॒नो अ॑द्यौत्। अ॒द्रो॒घो न द्र॑वि॒ता चे॑तति॒ त्मन्नम॑र्त्योऽव॒र्त्र ओष॑धीषु ॥३॥

तेजि॑ष्ठा । यस्य॑ । अ॒र॒तिः । व॒ने॒ऽराट् । तो॒दः । अध्व॑न् । न । वृ॒ध॒सा॒नः । अ॒द्यौ॒त् । अ॒द्रो॒घः । न । द्र॒वि॒ता । चे॒त॒ति॒ । त्मन् । अम॑र्त्यः । अ॒व॒र्त्रः । ओष॑धीषु ॥

Mantra without Swara
तेजिष्ठा यस्यारतिर्वनेराट् तोदो अध्वन्न वृधसानो अद्यौत्। अद्रोघो न द्रविता चेतति त्मन्नमर्त्योऽवर्त्र ओषधीषु ॥

तेजिष्ठा। यस्य। अरतिः। वनेऽराट्। तोदः। अध्वन्। न। वृधसानः। अद्यौत्। अद्रोघः। न। द्रविता। चेतति। त्मन्। अमर्त्यः। अवर्त्रः। ओषधीषु ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यस्य) जिस अग्नि के सदृश राजा की (तेजिष्ठा) अतिशय तेजस्विनी (अरतिः) प्राप्ति (वनेराट्) सेवन करने योग्य वा किरण में शोभित होनेवाली (अध्वन्) मार्ग में (वृधसानः) बढ़ती हुई (तोदः) पीड़ा (न) जैसे वैसे (अद्यौत्) प्रकाशित होती है वह (अद्रोघः) द्रोह से रहित (न) जैसे वैसे (द्रविता) चलनेवाला (त्मन्) आत्मा में (अमर्त्यः) मरणधर्म्म से रहित (अवर्त्रः) नहीं निवारण करने योग्य (ओषधीषु) सोमलता आदि ओषधियों में (चेतति) जनाता है ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस राजा की तेजस्विनी प्रकृति और प्रेरणा होवे, वह द्रोहरहित हुआ जैसे ओषधियाँ दुःखको, वैसे सब के दुःख का निवारण करता है, वही कृतकृत्य होता है ॥३॥
Subject
फिर राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥