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Rigveda Mandal 6 / Sukta 12 / Mantra 2

75 Sukta
6 Mantra
6/12/2
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ यस्मि॒न्त्वे स्वपा॑के यजत्र॒ यक्ष॑द्राजन्त्स॒र्वता॑तेव॒ नु द्यौः। त्रि॒ष॒धस्थ॑स्तत॒रुषो॒ न जंहो॑ ह॒व्या म॒घानि॒ मानु॑षा॒ यज॑ध्यै ॥२॥

आ । यस्मि॑न् । त्वे इति॑ । सु । अपा॑के । य॒ज॒त्र॒ । यक्ष॑त् । रा॒ज॒न् । स॒र्वता॑ताऽइव । नु । द्यौः । त्रि॒ऽस॒धस्थः॑ । त॒त॒रुषः॑ । न । जंहः॑ । ह॒व्या । म॒घानि॑ । मानु॑षा । यज॑ध्यै ॥

Mantra without Swara
आ यस्मिन्त्वे स्वपाके यजत्र यक्षद्राजन्त्सर्वतातेव नु द्यौः। त्रिषधस्थस्ततरुषो न जंहो हव्या मघानि मानुषा यजध्यै ॥

आ। यस्मिन्। त्वे इति। सु। अपाके। यजत्र। यक्षत्। राजन्। सर्वताताऽइव। नु। द्यौः। त्रिऽसधस्थः। ततरुषः। न। जंहः। हव्या। मघानि। मानुषा। यजध्यै ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (यजत्र) मेल करने योग्य (राजन्) राजा ! (यस्मिन्) जिन (अपाके) बुद्धि के परिपाक अर्थात् पूर्णता से रहित (त्वे) आप में (सर्वतातेव) सब की वृद्धि करनेवाला यज्ञ जैसे वैसे (द्यौः) बिजुली आदि का प्रकाश (सु) उत्तम प्रकार (आ, यक्षत्) सब ओर से मेल करे वह आप (नु) शीघ्र (त्रिषधस्थः) तीन पृथिवी, अन्तरिक्ष और सूर्य्यलोक में तुल्य स्थान में वर्त्तमान (ततरुषः) तारने और (जंहः) शीघ्र चलनेवाला (न) जैसे वैसे (हव्या) देने और ग्रहण करने योग्य (मानुषा) मनुष्य सम्बन्धी (मघानि) धनों को (यजध्यै) प्राप्त होने को यजन कीजिये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जहाँ सूर्य्य के सदृश प्रतापी राजा होता है, वहाँ सम्पूर्ण सुख होते हैं ॥२॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥