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Rigveda Mandal 6 / Sukta 11 / Mantra 5

75 Sukta
6 Mantra
6/11/5
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वृ॒ञ्जे ह॒ यन्नम॑सा ब॒र्हिर॒ग्नावया॑मि॒ स्रुग्घृ॒तव॑ती सुवृ॒क्तिः। अम्य॑क्षि॒ सद्म॒ सद॑ने पृथि॒व्या अश्रा॑यि य॒ज्ञः सूर्ये॒ न चक्षुः॑ ॥५॥

वृ॒ञ्जे । ह॒ । यत् । नम॑सा । ब॒र्हिः । अ॒ग्नौ । अया॑मि । स्रुक् । घृ॒तऽव॑ती । सु॒ऽवृ॒क्तिः । अम्य॑क्षि । सद्म॑ । सद॑ने । पृ॒थि॒व्याः । अश्रा॑यि । य॒ज्ञः । सूर्ये॑ । न । चक्षुः॑ ॥

Mantra without Swara
वृञ्जे ह यन्नमसा बर्हिरग्नावयामि स्रुग्घृतवती सुवृक्तिः। अम्यक्षि सद्म सदने पृथिव्या अश्रायि यज्ञः सूर्ये न चक्षुः ॥

वृञ्जे। ह। यत्। नमसा। बर्हिः। अग्नौ। अयामि। स्रुक्। घृतऽवती। सुऽवृक्तिः। अम्यक्षि। सद्म। सदने। पृथिव्याः। अश्रायि। यज्ञः। सूर्ये। न। चक्षुः ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 13 Mantra » 5

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Meaning
हे विद्वानो ! मैं (नमसा) अन्न आदि से (अग्नौ) अग्नि में (यत्) जिस (बर्हिः) घृत का (ह) निश्चय करके (वृञ्जे) त्याग करता हूँ और जो (सुवृक्तिः) सुवृक्ति अर्थात् उत्तम प्रकार चलते हैं जिसमें वह (घृतवती) बहुत जल से युक्त नदी (स्रुक्) बहनेवाली (अम्यक्षि) चलती है उसको (अयामि) प्राप्त होता हूँ और जो (यज्ञः) प्राप्त होने योग्य यज्ञ (सूर्य्ये) सूर्य्य में (चक्षुः) नेत्र (न) जैसे वैसे (पृथिव्याः) पृथिवी के (सदने) स्थान में (सद्म) रहने का स्थान अर्थात् गृह का (अश्रायि) आश्रयण करता है, उसका सब लोग अनुष्ठान करो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे हवन करनेवाले जन अग्नि में स्रुवा से घृत छोड़ते हैं, वैसे विद्वान् जन अन्य की बुद्धि में विद्या को छोड़ें और जैसे सूर्य्य के प्रकाश में नेत्र व्याप्त होता है, वैसे ही हवन किया गया द्रव्य अन्तरिक्ष मे व्याप्त होता है ॥५॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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