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Rigveda Mandal 6 / Sukta 11 / Mantra 4

75 Sukta
6 Mantra
6/11/4
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अदि॑द्युत॒त्स्वपा॑को वि॒भावाग्ने॒ यज॑स्व॒ रोद॑सी उरू॒ची। आ॒युं न यं नम॑सा रा॒तह॑व्या अ॒ञ्जन्ति॑ सुप्र॒यसं॒ पञ्च॒ जनाः॑ ॥४॥

अदि॑द्युतत् । सु । अपा॑कः । वि॒ऽभावा॑ । अग्ने॑ । यज॑स्व । रोद॑सी॒ इति॑ । उ॒रू॒ची इति॑ । आ॒युम् । न । यम् । नम॑सा । रा॒तऽह॑व्याः । अ॒ञ्जन्ति॑ । सु॒ऽप्र॒यस॑म् । पञ्च॑ । जनाः॑ ॥

Mantra without Swara
अदिद्युतत्स्वपाको विभावाग्ने यजस्व रोदसी उरूची। आयुं न यं नमसा रातहव्या अञ्जन्ति सुप्रयसं पञ्च जनाः ॥

अदिद्युतत्। सु। अपाकः। विऽभावा। अग्ने। यजस्व। रोदसी इति। उरूची इति। आयुम्। न। यम्। नमसा। रातऽहव्याः। अञ्जन्ति। सुऽप्रयसम्। पञ्च। जनाः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 13 Mantra » 4

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान विद्वज्जन ! (रातहव्याः) दिये गये देने योग्य (पञ्च) पाँच (जनाः) प्राणों के सदृश वर्त्तमान जन (नमसा) अन्न आदि से (यम्) जिस (सुप्रयसम्) उत्तम प्रकार प्रयत्न करनेवाले को (अञ्जन्ति) अच्छे प्रकार प्रकट करते हैं वह (सु) उत्तम प्रकार (अपाकः) नहीं परिपक्व (विभावा) अत्यन्त दीप्तिमान् जन (आयुम्) जीवन को (न) जैसे वैसे (अदिद्युतत्) प्रकाशित होता है, इस प्रकार आप (उरूची) बहुतों को प्राप्त होनेवाले (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (यजस्व) उत्तम प्रकार प्राप्त हों ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जिस प्रकार से पाँच प्राण शरीर को धारण करते हैं, वैसे ही नियमित आहार और विहार करनेवाले जन शरीर की अति कालपर्य्यन्त रक्षा करते हैं, वैसे ही विद्वानों के उपदेश विद्या को अतिकाल पर्य्यन्त स्थिर होनेवाली करते हैं ॥४॥
Subject
फिर विद्वान् जन कैसे हों, इस विषय को कहते हैं ॥

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