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Rigveda Mandal 6 / Sukta 10 / Mantra 4

75 Sukta
7 Mantra
6/10/4
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- आर्षीपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ यः प॒प्रौ जाय॑मान उ॒र्वी दू॑रे॒दृशा॑ भा॒सा कृ॒ष्णाध्वा॑। अध॑ ब॒हु चि॒त्तम॒ ऊर्म्या॑यास्ति॒रः शो॒चिषा॑ ददृशे पाव॒कः ॥४॥

आ । यः । प॒प्रौ । जाय॑मानः । उ॒र्वी इति॑ । दू॒रे॒ऽदृशा॑ । भा॒सा । कृ॒ष्णऽअ॑ध्वा । अध॑ । ब॒हु । चि॒त् । तमः॑ । ऊर्म्या॑याः । ति॒रः । शो॒चिषा॑ । द॒दृ॒शे॒ । पा॒व॒कः ॥

Mantra without Swara
आ यः पप्रौ जायमान उर्वी दूरेदृशा भासा कृष्णाध्वा। अध बहु चित्तम ऊर्म्यायास्तिरः शोचिषा ददृशे पावकः ॥

आ। यः। पप्रौ। जायमानः। उर्वी इति। दूरेऽदृशा। भासा। कृष्णऽअध्वा। अध। बहु। चित्। तमः। ऊर्म्यायाः। तिरः। शोचिषा। ददृशे। पावकः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 12 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (जायमानः) प्रकट हुआ (कृष्णाध्वा) कर्षित किया अर्थात् जिसे हल से जोतें, वैसे पहियों से सतीरा मार्ग जिसने वह (दूरेदृशा) जिससे दूर देखते हैं उस (भासा) प्रकाश से (उर्वी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (आ) चारों ओर से (पप्रौ) व्याप्त होता है और (अध) इसके अनन्तर (ऊर्म्यायाः) रात्रि का (बहु) बहुत (चित्) भी (तमः) अन्धकार (शोचिषा) प्रकाश से (तिरः) तिरस्कार करता है और (पावकः) पवित्रकर्त्ता हुआ (ददृशे) देखा जाता है, उसको आप लोग जानिये ॥४॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि अवश्य बिजुलीरूप अग्नि को जानें ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥