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Rigveda Mandal 6 / Sukta 10 / Mantra 1

75 Sukta
7 Mantra
6/10/1
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पु॒रो वो॑ म॒न्द्रं दि॒व्यं सु॑वृ॒क्तिं प्र॑य॒ति य॒ज्ञे अ॒ग्निम॑ध्व॒रे द॑धिध्वम्। पु॒र उ॒क्थेभिः॒ स हि नो॑ वि॒भावा॑ स्वध्व॒रा क॑रति जा॒तवे॑दाः ॥१॥

पु॒रः । वः॒ । म॒न्द्रम् । दि॒व्यम् । सु॒ऽवृ॒क्तिम् । प्र॒ऽय॒ति । य॒ज्ञे । अ॒ग्निम् । अ॒ध्व॒रे । द॒धि॒ध्व॒म् । पु॒रः । उ॒क्थेभिः॑ । सः । हि । नः॒ । वि॒भाऽवा॑ । सु॒ऽअ॒ध्व॒रा । का॒र॒ति॒ । जा॒तऽवे॑दाः ॥

Mantra without Swara
पुरो वो मन्द्रं दिव्यं सुवृक्तिं प्रयति यज्ञे अग्निमध्वरे दधिध्वम्। पुर उक्थेभिः स हि नो विभावा स्वध्वरा करति जातवेदाः ॥

पुरः। वः। मन्द्रम्। दिव्यम्। सुऽवृक्तिम्। प्रऽयति। यज्ञे। अग्निम्। अध्वरे। दधिध्वम्। पुरः। उक्थेभिः। सः। हि। नः। विभाऽवा। सुऽअध्वरा। करति। जातऽवेदाः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 12 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! आप लोग (वः) आप लोगों के (प्रयति) प्रयत्न से साध्य (अध्वरे) अहिंसनीय (यज्ञे) सङ्गतिस्वरूप यज्ञ में (उक्थेभिः) कहने के योग्यों से (पुरः) प्रथम (मन्द्रम्) आनन्द देनेवाले वा प्रशंसनीय (दिव्यम्) शुद्ध (सुवृक्तिम्) उत्तम प्रकार चलते हैं जिससे उस (अग्निम्) विद्युदादिस्वरूप अग्नि को (दधिध्वम्) धारण करिये और जो (हि) निश्चय करके (विभावा) विशेष करके प्रकाशक (जातवेदाः) प्रकट हुओं को जाननेवाला (नः) हम लोगों को (पुरः) प्रथम (स्वध्वरा) उत्तम प्रकार अहिंसा आदि धर्मों से युक्त (करति) करे (सः) वही हम लोगों से सत्कार करने योग्य है ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे यज्ञ करनेवाले यज्ञ में अग्नि को प्रथम उत्तम प्रकार स्थापित करके उस अग्नि में आहुति देकर संसार का उपकार करते हैं, वैसे ही आत्मा के आगे परमात्मा को संस्थापित करके वहाँ मन आदि का हवन करके और प्रत्यक्ष करके उसके उपदेश से जगत् का उपकार करो ॥१॥
Subject
अब मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥