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Rigveda Mandal 6 / Sukta 1 / Mantra 9

75 Sukta
13 Mantra
6/1/9
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सो अ॑ग्न ईजे शश॒मे च॒ मर्तो॒ यस्त॒ आन॑ट् स॒मिधा॑ ह॒व्यदा॑तिम्। य आहु॑तिं॒ परि॒ वेदा॒ नमो॑भि॒र्विश्वेत्स वा॒मा द॑धते॒ त्वोतः॑ ॥९॥

सः । अ॒ग्ने॒ । ई॒जे॒ । श॒श॒मे । च॒ । मर्तः॑ । यः । ते॒ । आन॑ट् । स॒म्ऽइधा॑ । ह॒व्यऽदा॑तिम् । यः । आऽहु॑तिम् । परि॑ । वे॒द॒ । नमः॑ऽभिः । विश्वा॑ । इत् । सः । वा॒मा । द॒ध॒ते॒ । त्वाऽऊ॑तः ॥

Mantra without Swara
सो अग्न ईजे शशमे च मर्तो यस्त आनट् समिधा हव्यदातिम्। य आहुतिं परि वेदा नमोभिर्विश्वेत्स वामा दधते त्वोतः ॥

सः। अग्ने। ईजे। शशमे। च। मर्तः। यः। ते। आनट्। सम्ऽइधा। हव्यऽदातिम्। यः। आऽहुतिम्। परि। वेद। नमःऽभिः। विश्वा। इत्। सः। वामा। दधते। त्वाऽऊतः ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 36 Mantra » 4

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान विद्वन् ! (ते) आप का (यः) जो (मर्त्तः) मनुष्य (समिधा) समिध् से (हव्यदातिम्) हवन करने योग्य वस्तुओं के देनेवाले को (आनट्) व्याप्त होता है, उसको जाननेवाला (सः) वह मैं उसको (ईजे) उत्तम प्रकार प्राप्त होता और (शशमे) प्रशंसा करता हूँ (च) और (यः) जो (आहुतिम्) आहुति को अर्थात् जो चारों ओर होमी जाती उस सामग्री को (परि) सब प्रकार से (वेदा) जानता है (सः) वह (त्वोतः) आप से रक्षित हुआ (नमोभिः) अन्न आदिकों वा सत्कारों से (विश्वा) सम्पूर्ण (वामा) प्रशंसा करने योग्य कर्म्मों को (इत्) ही (दधते) धारण करता है ॥९॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो प्रशंसित कार्य्यों का करनेवाला अग्नि है, उसको विशेष कर जानिये ॥९॥
Subject
फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥

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