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Rigveda Mandal 6 / Sukta 1 / Mantra 7

75 Sukta
13 Mantra
6/1/7
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तं त्वा॑ व॒यं सु॒ध्यो॒३॒॑ नव्य॑मग्ने सुम्ना॒यव॑ ईमहे देव॒यन्तः॑। त्वं विशो॑ अनयो॒ दीद्या॑नो दि॒वो अ॑ग्ने बृह॒ता रो॑च॒नेन॑ ॥७॥

त्वम् । त्वा॒ । व॒यम् । सु॒ऽध्यः॑ । नव्य॑म् । अ॒ग्ने॒ । सु॒म्न॒ऽयवः॑ । ई॒म॒हे॒ । दे॒व॒ऽयन्तः॑ । त्वम् । विशः॑ । अ॒न॒यः॒ । दीद्या॑नः । दि॒वः । अ॒ग्ने॒ । बृ॒ह॒ता । रो॒च॒नेन॑ ॥

Mantra without Swara
तं त्वा वयं सुध्यो३ नव्यमग्ने सुम्नायव ईमहे देवयन्तः। त्वं विशो अनयो दीद्यानो दिवो अग्ने बृहता रोचनेन ॥

त्वम्। त्वा। वयम्। सुऽध्यः। नव्यम्। अग्ने। सुम्नऽयवः। ईमहे। देवऽयन्तः। त्वम्। विशः। अनयः। दीद्यानः। दिवः। अग्ने। बृहता। रोचनेन ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 36 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान विद्वन् ! जैसे (सुध्यः) उत्तम बुद्धियुक्त (सुम्नायवः) अपने सुख की इच्छा करनेवाले (देवयन्तः) कामना करते हुए (वयम्) हम लोग (तम्) उस (नव्यम्) नवीन पदार्थों में हुए अग्नि को (ईमहे) व्याप्त होवें, वैसे (त्वा) आपको प्राप्त होवें और हे (अग्ने) अग्नि के सदृश विद्या से प्रकाशित ! जैसे सूर्य्य (बृहता) बड़े (रोचनेन) प्रकाश से (दीद्यानः) प्रकाशित होता हुआ (दिवः) कामना करने के योग्य पदार्थों को (विशः) प्रजाओं को (अनयः) पहुँचाता है, वैसे (त्वम्) आप इनको प्राप्त कराइये ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो विद्वान् जनों के सदृश अग्नि का अनुचरण करते हैं, वे कृतकार्य्य होते हैं ॥७॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसे होकर क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥