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Rigveda Mandal 6 / Sukta 1 / Mantra 13

75 Sukta
13 Mantra
6/1/13
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
पु॒रूण्य॑ग्ने पुरु॒धा त्वा॒या वसू॑नि राजन्व॒सुता॑ ते अश्याम्। पु॒रूणि॒ हि त्वे पु॑रुवार॒ सन्त्यग्ने॒ वसु॑ विध॒ते राज॑नि॒ त्वे ॥१३॥

पु॒रूणि॑ । अ॒ग्ने॒ । पु॒रु॒धा । त्वा॒ऽया । वसू॑नि । रा॒ज॒न् । व॒सुता॑ । ते॒ । अ॒श्या॒म् । पु॒रूणि । हि । त्वे इति॑ । पु॒रु॒ऽवा॒र॒ । सन्ति॑ । अग्ने॑ । वसु॑ । वि॒ध॒ते । राज॑नि । त्वे इति॑ ॥

Mantra without Swara
पुरूण्यग्ने पुरुधा त्वाया वसूनि राजन्वसुता ते अश्याम्। पुरूणि हि त्वे पुरुवार सन्त्यग्ने वसु विधते राजनि त्वे ॥

पुरूणि। अग्ने। पुरुधा। त्वाऽया। वसूनि। राजन्। वसुता। ते। अश्याम्। पुरूणि। हि। त्वे इति। पुरुऽवार। सन्ति। अग्ने। वसु। विधते। राजनि। त्वे इति ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 36 Mantra » 8

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (राजन्) विद्या और विनय से प्रकाशमान (ते) आपके समीप जो (वसुता) द्रव्यों का होना उसमें वर्त्तमान (पुरूणि) बहुत और (पुरुधा) बहुत प्रकारों से धारण किये हुए (वसूनि) द्रव्यों को (त्वाया) आपके साथ मैं (अश्याम्) प्राप्त होऊँ और हे (पुरुवार) बहुतों से स्वीकार करने योग्य (अग्ने) विद्या और विनय से प्रकाशमान (हि) निश्चय से (त्वे) आप में (पुरूणि) बहुत द्रव्य (सन्ति) हैं (राजनि) राजा (त्वे) आपके होने पर (वसु) द्रव्य का (विधते) विधान करनेवाले के लिये कल्याण होता है, वह आप हमारे राजा हूजिये ॥१३॥
Essence
वे ही राजा उत्तम हैं जो परमेश्वर के सदृश पक्षपात का त्याग करके पुत्र के सदृश प्रजाओं का पालन करते हैं और वे ही प्रजाजन श्रेष्ठ होते हैं जो राजा और ईश्वर के भक्त हैं ॥१३॥ इस सूक्त में अग्नि, विद्वान् और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ इस अध्याय में मित्रावरुण, अश्वि, सूर्य, वायु और अग्नि आदि के गुणवर्णन करने से इस अध्याय में कहे हुए अर्थ की इससे पूर्व अध्याय के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह श्रीमत्परहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमद्विरजानन्द सरस्वती स्वामी जी के शिष्य श्रीमद्दयानन्द सरस्वती स्वामिविरचित संस्कृतार्य्यभाषाविभूषित ऋग्वेदभाष्य में चतुर्थ अष्टक में चतुर्थ अध्याय, छत्तीसवाँ वर्ग और छठे मण्डल में प्रथम सूक्त भी समाप्त हुआ ॥
Subject
अब ईश्वर के तुल्य प्रजापालन विषय को कहते हैं ॥

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