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Rigveda Mandal 6 / Sukta 1 / Mantra 11

75 Sukta
13 Mantra
6/1/11
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ यस्त॒तन्थ॒ रोद॑सी॒ वि भा॒सा श्रवो॑भिश्च श्रव॒स्य१॒॑स्तरु॑त्रः। बृ॒हद्भि॒र्वाजैः॒ स्थवि॑रेभिर॒स्मे रे॒वद्भि॑रग्ने वित॒रं वि भा॑हि ॥११॥

आ । यः । त॒तन्थ॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । वि । भा॒सा । श्रवः॑ऽभिः । च॒ । श्र॒व॒स्यः॑ । तरु॑त्रः । बृ॒हत्ऽभिः॑ । वाजैः॑ । स्थवि॑रेभिः । अ॒स्मे इति॑ । रे॒वत्ऽभिः॑ । अ॒ग्ने॒ । वि॒ऽत॒रम् । वि । भा॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
आ यस्ततन्थ रोदसी वि भासा श्रवोभिश्च श्रवस्य१स्तरुत्रः। बृहद्भिर्वाजैः स्थविरेभिरस्मे रेवद्भिरग्ने वितरं वि भाहि ॥

आ। यः। ततन्थ। रोदसी इति। वि। भासा। श्रवःऽभिः। च। श्रवस्यः। तरुत्रः। बृहत्ऽभिः। वाजैः। स्थविरेभिः। अस्मे इति। रेवत्ऽभिः। अग्ने। विऽतरम्। वि। भाहि ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 36 Mantra » 6

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (यः) जो अग्नि (भासा) प्रकाश से और (श्रवोभिः) श्रवण आदि वा अन्न आदि से (च) भी (श्रवस्यः) सुनने के योग्य और (तरुत्रः) दुःख से पार करनेवाला (बृहद्भिः) बड़े और (स्थविरेभिः) स्थूल अर्थात् भारी (वाजैः) संग्रामों के सहित वर्त्तमान (रेवद्भिः) बहुत धनों से युक्त जनों के साथ (रोदसी) द्यावापृथिवी को (वि, आ, ततन्थ) विशेष कर सब प्रकार विस्तार करता है तथा (अस्मे) हम लोगों के लिये उस (वितरम्) वितर अर्थात् विविध प्रकार से तरते हैं जिससे उसको (वि, भाहि) उत्तम प्रकार प्रकाशित कीजिये ॥११॥
Essence
जो विद्वान् जन उत्तम विद्या से अग्नि के प्रभाव को जानें तो विस्मय को प्राप्त होकर चकित होवें ॥११॥
Subject
फिर मनुष्य किस को प्राप्त होवें, इस विषय को कहते हैं ॥

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