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Rigveda Mandal 6 / Sukta 1 / Mantra 1

75 Sukta
13 Mantra
6/1/1
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं ह्य॑ग्ने प्रथ॒मो म॒नोता॒स्या धि॒यो अभ॑वो दस्म॒ होता॑। त्वं सीं॑ वृषन्नकृणोर्दु॒ष्टरी॑तु॒ सहो॒ विश्व॑स्मै॒ सह॑से॒ सह॑ध्यै ॥१॥

त्वम् । हि । अ॒ग्ने॒ । प्र॒थ॒मः । म॒नोता॑ । अ॒स्याः । धि॒यः । अभ॑वः । दस्म॑ । होता॑ । त्वम् । सी॒म् । वृ॒ष॒न् । अ॒कृत॒णोः॒ । दु॒स्तरी॑तु । सहः॑ । विश्व॑स्मै । सह॑से । सह॑ध्यै ॥

Mantra without Swara
त्वं ह्यग्ने प्रथमो मनोतास्या धियो अभवो दस्म होता। त्वं सीं वृषन्नकृणोर्दुष्टरीतु सहो विश्वस्मै सहसे सहध्यै ॥

त्वम्। हि। अग्ने। प्रथमः। मनोता। अस्याः। धियः। अभवः। दस्म। होता। त्वम्। सीम्। वृषन्। अकृतणोः। दुस्तरीतु। सहः। विश्वस्मै। सहसे। सहध्यै ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 35 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी (दस्म) दुःख के नाश करनेवाले विद्वान् जन जैसे (प्रथमः) आदिम (मनोता) मन के समान जानेवाले और (होता) दान करनेवाले हुए (त्वम्) आप (हि) निश्चय से (अस्याः) इस (धियः) बुद्धि की वृद्धि करते हुए सुखयुक्त (अभवः) होते हो। और हे (वृषन्) वीर्य्य के सींचनेवाले (त्वम्) आप (सीम्) सब ओर से (विश्वस्मै) सम्पूर्ण प्राणियों के लिये (सहः) सहनशील (सहसे) बल के लिये (सहध्यै) सहने का (दुष्टरीतु) दुःख से उल्लङ्घन करने योग्य (अकृणोः) करते हो, वैसे बिजुलीरूप अग्नि करता है ॥१॥
Essence
जो विद्वान् जन मूर्ख लोगों से किये हुए अपराधों को सहकर सम्पूर्ण जनों के सुख के लिये प्रयत्न करते हैं, वही सब के हितकारी होते हैं ॥१॥
Subject
अब छठे मण्डल में तेरह ऋचावाले प्रथम सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् जन अग्नि के सदृश क्या-क्या करें? इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥