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Rigveda Mandal 5 / Sukta 9 / Mantra 7

87 Sukta
7 Mantra
5/9/7
Devata- अग्निः Rishi- गय आत्रेयः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तं नो॑ अग्ने अ॒भी नरो॑ र॒यिं स॑हस्व॒ आ भ॑र। स क्षे॑पय॒त्स पो॑षय॒द्भुव॒द्वाज॑स्य सा॒तय॑ उ॒तैधि॑ पृ॒त्सु नो॑ वृ॒धे ॥७॥

तत् । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । अ॒भि । नरः॑ । र॒यिम् । स॒ह॒स्वः॒ । आ । भ॒र॒ । सः । क्षे॒प॒य॒त् । सः । पो॒ष॒य॒त् । भुव॑त् । वाज॑स्य । सा॒तये॑ । उ॒त । ए॒धि॒ । नः॒ । वृ॒धे ॥

Mantra without Swara
तं नो अग्ने अभी नरो रयिं सहस्व आ भर। स क्षेपयत्स पोषयद्भुवद्वाजस्य सातय उतैधि पृत्सु नो वृधे ॥

तम्। नः। अग्ने। अभि। नरः। रयिम्। सहस्वः। आ। भर। सः। क्षेपयत्। सः। पोषयत्। भुवत्। वाजस्य। सातये। उत। एधि। पृतऽसु। नः। वृधे ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 1 Mantra » 7

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Meaning
हे (सहस्वः) बहुत सहन आदि गुणों से युक्त (अग्ने) विद्वन् ! जो आप (नः) हम लोगों के (नरः) नायक अर्थात् कार्य्यों में अग्रगामियों और (रयिम्) धन को (अभि) सन्मुख (आ, भर) सब प्रकार धारण करें (तम्) उनका हम लोग सत्कार करें (सः) वह आप हम लोगों की (क्षेपयत्) प्रेरणा करें और (पोषयत्) पोषण पालन करें (सः) वह (वाजस्य) अन्न आदि के (सातये) संविभाग के लिये (भुवत्) होवें (उत) और (पृत्सु) सङ्ग्रामों में (नः) हम लोगों की (वृधे) वृद्धि के लिये (एधि) हूजिये ॥७॥
Essence
सुकर्म्मों के जानने की इच्छा करनेवालों को चाहिये कि विद्वानों के प्रति यह प्रार्थना करें कि आप लोग हम लोगों को श्रेष्ठ गुणों में प्रेरित करो और ब्रह्मचर्य्य आदि से पुष्ट करो और सत्य और असत्य के विभाग करनेवाले और युद्धविद्या में चतुर जन हम लोगों की निरन्तर रक्षा करें ॥७॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह नवमा सूक्त और पहला वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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