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Rigveda Mandal 5 / Sukta 9 / Mantra 6

87 Sukta
7 Mantra
5/9/6
Devata- अग्निः Rishi- गय आत्रेयः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तवा॒हम॑ग्न ऊ॒तिभि॑र्मि॒त्रस्य॑ च॒ प्रश॑स्तिभिः। द्वे॒षो॒युतो॒ न दु॑रि॒ता तु॒र्याम॒ मर्त्या॑नाम् ॥६॥

तव॑ । अ॒हम् । अ॒ग्ने॒ । ऊ॒तिऽभिः॑ । मि॒त्रस्य॑ । च॒ । प्रश॑स्तिऽभिः । द्वे॒षः॒ऽयुतः॑ । न । दुः॒ऽइ॒ता । तु॒र्याम॑ । मर्त्या॑नाम् ॥

Mantra without Swara
तवाहमग्न ऊतिभिर्मित्रस्य च प्रशस्तिभिः। द्वेषोयुतो न दुरिता तुर्याम मर्त्यानाम् ॥

तव। अहम्। अग्ने। ऊतिऽभिः। मित्रस्य। च। प्रशस्तिऽभिः। द्वेषःऽयुतः। न। दुःऽइता। तुर्याम। मर्त्यानाम् ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 1 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् (अहम्) मैं (मित्रस्य) मित्र (तव) आपकी (ऊतिभिः) रक्षा आदिकों से और (प्रशस्तिभिः) प्रशंसाओं से (च) भी प्रशंसित होऊँ, वैसे आप हूजिये और सब हम लोग मिल कर (द्वेषोयुतः) द्वेषयुक्तों के (न) सदृश (मर्त्यानाम्) मनुष्यों के (दुरिता) दुःख से प्राप्त हुए दोषों की (तुर्याम) हिंसा करें ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे मित्र मित्र की प्रशंसा करता और शत्रुजन हित का नाश करते हैं, वैसे ही मित्रता करके मनुष्यों के दुःखों का हम नाश करें ॥६॥
Subject
फिर मित्रभाव से उक्त विषय को कहते हैं ॥