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Rigveda Mandal 5 / Sukta 9 / Mantra 3

87 Sukta
7 Mantra
5/9/3
Devata- अग्निः Rishi- गय आत्रेयः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उ॒त स्म॒ यं शिशुं॑ यथा॒ नवं॒ जनि॑ष्टा॒रणी॑। ध॒र्तारं॒ मानु॑षीणां वि॒शाम॒ग्निं स्व॑ध्व॒रम् ॥३॥

उ॒त । स्म॒ । यम् । शिशु॑म् । यथा॑ । नव॑म् । जनि॑ष्ट । अ॒रणी॒ इति॑ । ध॒र्तार॑म् । मानु॑षीणाम् । वि॒शाम् । अ॒ग्निम् । सु॒ऽअ॒ध्व॒रम् ॥

Mantra without Swara
उत स्म यं शिशुं यथा नवं जनिष्टारणी। धर्तारं मानुषीणां विशामग्निं स्वध्वरम् ॥

उत। स्म। यम्। शिशुम्। यथा। नवम्। जनिष्ट। अरणी इति। धर्तारम्। मानुषीणाम्। विशाम्। अग्निम्। सुऽअध्वरम् ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 1 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यथा) जैसे माता और पिता (नवम्) नवीन (शिशुम्) बालक को (जनिष्ट) उत्पन्न करते हैं, वैसे (स्म) ही (यम्) जिसको (अरणी) काष्ठविशेषों के सदृश (मानुषीणाम्) मनुष्य आदि (विशाम्) प्रजाओं के (धर्त्तारम्) धारण करनेवाले (उत) भी (स्वध्वरम्) उत्तम प्रकार अहिंसारूप धर्म को प्राप्त (अग्निम्) अग्नि को विद्वान् जन उत्पन्न करें ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे माता-पिता श्रेष्ठ सन्तान को उत्पन्न करके सुख को प्राप्त होते हैं, वैसे विद्वान् जन बिजुलीरूप अग्नि को उत्पन्न करके ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं ॥३॥
Subject
फिर अग्निविषय को कहते हैं ॥