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Rigveda Mandal 5 / Sukta 9 / Mantra 1

87 Sukta
7 Mantra
5/9/1
Devata- अग्निः Rishi- गय आत्रेयः Chhanda- स्वराडुष्निक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वाम॑ग्ने ह॒विष्म॑न्तो दे॒वं मर्ता॑स ईळते। मन्ये॑ त्वा जा॒तवे॑दसं॒ स ह॒व्या व॑क्ष्यानु॒षक् ॥१॥

त्वाम् । अ॒ग्ने॒ । ह॒विष्म॑न्तः । दे॒वम् । मर्ता॑सः । ई॒ळ॒ते॒ । मन्ये॑ । त्वा॒ । जा॒तऽवे॑दसम् । सः । ह॒व्या । व॒क्षि॒ । आ॒नु॒षक् ॥

Mantra without Swara
त्वामग्ने हविष्मन्तो देवं मर्तास ईळते। मन्ये त्वा जातवेदसं स हव्या वक्ष्यानुषक् ॥

त्वाम्। अग्ने। हविष्मन्तः। देवम्। मर्तासः। ईळते। मन्ये। त्वा। जातऽवेदसम्। सः। हव्या। वक्षि। आनुषक् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 1 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान जैसे (हविष्मन्तः) अच्छे दान आदि से युक्त (मर्त्तासः) मनुष्य (जातवेदसम्) उत्पन्न हुए पदार्थों को जाननेवाले (देवम्) प्रकाशमान अग्नि की प्रशंसा करते हैं, वैसे (त्वाम्) विद्वान् आपकी (ईळते) स्तुति करते हैं मैं जिन (त्वा) आप को (मन्ये) मानता हूँ (सः) वह आप (हव्या) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को (आनुषक्) अनुकूलता से (वक्षि) धारण करते हो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो अग्नि आदि के गुणों को ढूँढ़ते हैं, वे ही विद्या के अनुकूल व्यवहारों को उत्पन्न करते हैं ॥१॥
Subject
अब चतुर्थ अष्टक में सात ऋचावाले नवम सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्न्यादि पदार्थों के गुणों को कहते हैं ॥

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