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Rigveda Mandal 5 / Sukta 87 / Mantra 4

87 Sukta
9 Mantra
5/87/4
Devata- मरूतः Rishi- एवयामरुदात्रेयः Chhanda- स्वराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स च॑क्रमे मह॒तो निरु॑रुक्र॒मः स॑मा॒नस्मा॒त्सद॑स एव॒याम॑रुत्। य॒दायु॑क्त॒ त्मना॒ स्वादधि॒ ष्णुभि॒र्विष्प॑र्धसो॒ विम॑हसो॒ जिगा॑ति॒ शेवृ॑धो॒ नृभिः॑ ॥४॥

सः । च॒क्र॒मे॒ । म॒ह॒तः । निः । उ॒रु॒ऽकृअ॒मः । स॒मा॒नस्मा॑त् । सद॑सः । ए॒व॒याम॑रुत् । य॒दा । अयु॑क्त । त्मना॑ । स्वात् । अधि॑ । स्नुऽभिः॑ । विऽस्प॑र्धसः । विऽम॑हसः । जिगा॑ति । शेऽवृ॑धः । नृऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
स चक्रमे महतो निरुरुक्रमः समानस्मात्सदस एवयामरुत्। यदायुक्त त्मना स्वादधि ष्णुभिर्विष्पर्धसो विमहसो जिगाति शेवृधो नृभिः ॥

सः। चक्रमे। महतः। निः। उरुऽक्रमः। समानस्मात्। सदसः। एवयामरुत्। यदा। अयुक्त। त्मना। स्वात्। अधि। स्नुऽभिः। विऽस्पर्धसः। विऽमहसः। जिगाति। शेऽवृधः। नृऽभिः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 33 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (एवयामरुत्) विज्ञानवाला मनुष्य (उरुक्रमः) जो बहुत क्रमवाला (समानस्मात्) तुल्य (महतः) बड़े (सदसः) गृह से (निः) निरन्तर (चक्रमे) क्रमण करता है उसको जो (त्मना) आत्मा से (यदा) जब (अयुक्त) युक्त होता है (स्नुभिः) तथा पवित्र गुणों और (नृभिः) नायकों के साथ वर्त्तमान (स्वात्) अपने से (विष्पर्धसः) विशेष करके स्पर्द्धा करनेवाले (विमहसः) विशेष करके बड़े गुणों से विशिष्ट और (शेवृधः) सुख के बढ़ानेवालों को (अधि, जिगाति) प्राप्त होता है (सः) वह परमेश्वर उपासना करने योग्य और योगीजन सेवन करने योग्य है ॥४॥
Essence
जो मनुष्य विद्वान् पुरुष के द्वारा परमेश्वर के योग का अभ्यास करते हैं, वे सुख के धारण करनेवाले होते हैं ॥४॥
Subject
अब ईश्वर के उपासनाविषय को कहते हैं ॥