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Rigveda Mandal 5 / Sukta 86 / Mantra 4

87 Sukta
6 Mantra
5/86/4
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- अत्रिः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ता वा॒मेषे॒ रथा॑नामिन्द्रा॒ग्नी ह॑वामहे। पती॑ तु॒रस्य॒ राध॑सो वि॒द्वांसा॒ गिर्व॑णस्तमा ॥४॥

आ । वा॒म् । एषे॑ । रथा॑नाम् । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । ह॒वा॒म॒हे॒ । पती॒ इति॑ । तु॒रस्य॑ । राध॑सः । वि॒द्वांसा॑ । गिर्व॑णःऽतमा ॥

Mantra without Swara
ता वामेषे रथानामिन्द्राग्नी हवामहे। पती तुरस्य राधसो विद्वांसा गिर्वणस्तमा ॥

ता। वाम्। एषे। रथानाम्। इन्द्राग्नी इति। हवामहे। पती इति। तुरस्य। राधसः। विद्वांसा। गिर्वणःऽतमा ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 32 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (रथानाम्) वाहनों और (तुरस्य) शीघ्र सुखकारक (राधसः) धन के (पती) पालन करनेवाले (गिर्वणस्तमा) अतिशय उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी का सेवन करते हुए (विद्वांसा) विद्या से युक्त (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली (वाम्) और आप दोनों को (एषे) प्राप्त होने के लिये हम लोग (हवामहे) प्राप्त होने की इच्छा करें (ता) उन दोनों को आप लोग भी प्राप्त होओ ॥४॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि वायु और बिजुली के सदृश श्रेष्ठ गुणों से व्याप्त विद्वानों के सङ्ग से विद्या और शिक्षा को प्राप्त होकर प्रजाओं में मित्र के सदृश वर्त्ताव करें ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥