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Rigveda Mandal 5 / Sukta 86 / Mantra 2

87 Sukta
6 Mantra
5/86/2
Devata- वरुणः Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
या पृत॑नासु दु॒ष्टरा॒ या वाजे॑षु श्र॒वाय्या॑। या पञ्च॑ चर्ष॒णीर॒भी॑न्द्रा॒ग्नी ता ह॑वामहे ॥२॥

या । पृत॑नासु । दु॒स्तरा॑ । या । वाजे॑षु । श्र॒वाय्या॑ । या । पञ्च॑ । च॒र्ष॒णीः । अ॒भि । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । ता । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
या पृतनासु दुष्टरा या वाजेषु श्रवाय्या। या पञ्च चर्षणीरभीन्द्राग्नी ता हवामहे ॥

या। पृतनासु। दुस्तरा। या। वाजेषु। श्रवाय्या। या। पञ्च। चर्षणीः। अभि। इन्द्राग्नी इति। ता। हवामहे ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 32 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली के समान वर्त्तमान सेनापति और अध्यक्ष ! (या) जो सेना के शिक्षक और लड़ानेवाले (पृतनासु) सेनाओं में (दुष्टरा) दुःख से उल्लङ्घन करने योग्य (या) जो (वाजेषु) अन्नादिकों वा संग्रामों में (श्रवाय्या) प्रशंसा करने योग्य (या) जो (पञ्च) पाँच (चर्षणीः) प्राणों वा मनुष्यों को (अभि) सम्मुख रक्षा करते हैं (ता) उन दोनों को हम लोग (हवामहे) स्वीकार करें वा प्रशंसा करें ॥२॥
Essence
राजा और सेनापति को चाहिये कि उत्तम प्रकार परीक्षा करके सेना के अध्यक्ष भृत्यों को रक्खें, जिससे सर्वदा विजय होवे ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥