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Rigveda Mandal 5 / Sukta 84 / Mantra 3

87 Sukta
3 Mantra
5/84/3
Devata- पृथिवी Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
दृ॒ळ्हा चि॒द्या वन॒स्पती॑न्क्ष्म॒या दर्ध॒र्ष्योज॑सा। यत्ते॑ अ॒भ्रस्य॑ वि॒द्युतो॑ दि॒वो वर्ष॑न्ति वृ॒ष्टयः॑ ॥३॥

दृ॒ळ्हा । चि॒त् । या । वन॒स्पती॑न् । क्ष्म॒या । दर्ध॑र्षि । ओज॑सा । यत् । ते॒ । अ॒भ्रस्य॑ । वि॒ऽद्युतः॑ । दि॒वः । वर्ष॑न्ति । वृ॒ष्टयः॑ ॥

Mantra without Swara
दृळ्हा चिद्या वनस्पतीन्क्ष्मया दर्धर्ष्योजसा। यत्ते अभ्रस्य विद्युतो दिवो वर्षन्ति वृष्टयः ॥

दृळ्हा। चित्। या। वनस्पतीन्। क्ष्मया। दर्धर्षि। ओजसा। यत्। ते। अभ्रस्य। विऽद्युतः। दिवः। वर्षन्ति। वृष्टयः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 29 Mantra » 3

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Meaning
हे स्त्रि ! (या) जो (दृळ्हा) दृढ़ तुम (क्ष्मया) पृथिवी से (वनस्पतीन्) वृक्षादिकों को (दर्धर्षि) अत्यन्त धारण करती हो और (यत्) जो (चित्) निश्चित (ते) आप के (अभ्रस्य) घन की (दिवः) अन्तरिक्ष में हुई (विद्युतः) बिजुली और (वृष्टयः) वर्षायें (वर्षन्ति) वर्षती हैं, उनको तुम (ओजसा) बल से धारण करो ॥३॥
Essence
जो स्त्री पृथिवी के सदृश क्षमा से युक्त और पुत्र-पौत्रादि से युक्त होती है, वह वृष्टि के सदृश सुखों को वर्षानेवाली होती है ॥३॥ इस सूक्त में मेघ विद्वान् और स्त्री के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह चौरासीवाँ सूक्त और उनतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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