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Rigveda Mandal 5 / Sukta 84 / Mantra 1

87 Sukta
3 Mantra
5/84/1
Devata- पृथिवी Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
बळि॒त्था पर्व॑तानां खि॒द्रं बि॑भर्षि पृथिवि। प्र या भूमिं॑ प्रवत्वति म॒ह्ना जि॒नोषि॑ महिनि ॥१॥

बट् । इ॒त्था । पर्व॑तानाम् । खि॒द्रम् । बि॒भ॒र्षि॒ । पृ॒थि॒वि॒ । प्र । या । भूमि॑म् । प्र॒व॒त्व॒ति॒ । म॒ह्ना । जि॒नोषि॑ । म॒हि॒नि॒ ॥

Mantra without Swara
बळित्था पर्वतानां खिद्रं बिभर्षि पृथिवि। प्र या भूमिं प्रवत्वति मह्ना जिनोषि महिनि ॥

बट्। इत्था। पर्वतानाम्। खिद्रम्। बिभर्षि। पृथिवि। प्र। या। भूमिम्। प्रवत्वति। मह्ना। जिनोषि। महिनि ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 29 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (प्रवत्वति) अत्यन्त नीचे स्थान से युक्त (महिनि) आदर करने योग्य (पृथिवि) भूमि के सदृश वर्त्तमान ! (या) जो तुम (पर्वतानाम्) मेघों के (मह्ना) महत्त्व से (भूमिम्) भूमि को धारण करती (इत्था) इस प्रकार से (बट्) सत्य को जिस कारण (बिभर्षि) धारण करती हो तथा (खिद्रम्) दीनता को (प्र, जिनोषि) विशेष करके नष्ट करती हो, इससे सत्कार करने योग्य हो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे भूमि पर पर्वत स्थिर होकर वर्त्तमान हैं, वैसे जिनके हृदय में धर्म आदि श्रेष्ठ व्यवहार हैं, वे आदर करने योग्य होते हैं ॥१॥
Subject
अब तीन ऋचावाले चौरासीवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥