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Rigveda Mandal 5 / Sukta 83 / Mantra 4

87 Sukta
10 Mantra
5/83/4
Devata- पृथिवी Rishi- अत्रिः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र वाता॒ वान्ति॑ प॒तय॑न्ति वि॒द्युत॒ उदोष॑धी॒र्जिह॑ते॒ पिन्व॑ते॒ स्वः॑। इरा॒ विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय जायते॒ यत्प॒र्जन्यः॑ पृथि॒वीं रेत॒साव॑ति ॥४॥

प्र । वाताः॑ । वान्ति॑ । प॒तय॑न्ति । वि॒ऽद्युतः॑ । उत् । ओष॑धीः । जिह॑ते । पिन्व॑ते । स्वः॑ । इरा॑ । विश्व॑स्मै । भुव॑नाय । जा॒य॒ते॒ । यत् । प॒र्जन्यः॑ । पृ॒थि॒वीम् । रेत॑सा । अव॑ति ॥

Mantra without Swara
प्र वाता वान्ति पतयन्ति विद्युत उदोषधीर्जिहते पिन्वते स्वः। इरा विश्वस्मै भुवनाय जायते यत्पर्जन्यः पृथिवीं रेतसावति ॥

प्र। वाताः। वान्ति। पतयन्ति। विऽद्युतः। उत्। ओषधीः। जिहते। पिन्वते। स्व१रिति स्वः। इरा। विश्वस्मै। भुवनाय। जायते। यत्। पर्जन्यः। पृथिवीम्। रेतसा। अवति ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 27 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (पर्जन्यः) पालनों को उत्पन्न करनेवाला मेघ (रेतसा) जल से (पृथिवीम्) भूमि की (अवति) रक्षा करता है जिससे (विश्वस्मै) सम्पूर्ण (भुवनाय) भुवन के लिये (इरा) अन्न आदिक (जायते) उत्पन्न होता है और बादल (स्वः) अन्तरिक्ष का (पिन्वते) सेवन करते हैं और जिससे (ओषधीः) ओषधियों को (उत्, जिहते) उत्तमता से प्राप्त होते हैं जिससे (विद्युतः) बिजुलियाँ (पतयन्ति) पतन होती है, जहाँ (वाताः) पवन (प्र) अत्यन्त (वान्ति) चलते हैं, उस मेघ को यथावत् तुम विशेष जानो ॥४॥
Essence
मनुष्य लोगों को चाहिये कि जिस मेघ से सबका पालन होता है, उसकी वृद्धि वृक्षों के लगने, वनों की रक्षा करने और होम करने से सिद्ध करें, जिससे सब का पालन सुख से होवे ॥४॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या जानना योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥