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Rigveda Mandal 5 / Sukta 83 / Mantra 3

87 Sukta
10 Mantra
5/83/3
Devata- पृथिवी Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
र॒थीव॒ कश॒याश्वाँ॑ अभिक्षि॒पन्ना॒विर्दू॒तान्कृ॑णुते व॒र्ष्याँ॒३॒॑ अह॑। दू॒रात्सिं॒हस्य॑ स्त॒नथा॒ उदी॑रते॒ यत्प॒र्जन्यः॑ कृणु॒ते व॒र्ष्यं१॒॑ नभः॑ ॥३॥

र॒थीऽइ॑व । कश॑या । अश्वा॑न् । अ॒भि॒ऽक्षि॒पन् । आ॒विः । दू॒तान् । कृ॒णु॒ते॒ । व॒र्ष्या॑न् । अह॑ । दू॒रात् । सिं॒हस्य॑ । स्त॒नथाः॑ । उत् । ई॒र॒ते॒ । यत् । प॒र्जन्यः॑ । कृ॒णु॒ते । व॒र्ष्य॑म् । नभः॑ ॥

Mantra without Swara
रथीव कशयाश्वाँ अभिक्षिपन्नाविर्दूतान्कृणुते वर्ष्याँ३ अह। दूरात्सिंहस्य स्तनथा उदीरते यत्पर्जन्यः कृणुते वर्ष्यं१ नभः ॥

रथीऽइव। कशया। अश्वान्। अभिऽक्षिपन्। आविः। दूतान्। कृणुते। वर्ष्यान्। अह। दूरात्। सिंहस्य। स्तनथाः। उत्। ईरते। यत्। पर्जन्यः। कृणुते। वर्ष्यम्। नभः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 27 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वन् ! (यत्) जो (पर्जन्यः) मेघ (कशया) मारने के लिये रस्सी अर्थात् कोड़े से (अश्वान्) घोड़ों को (अभिक्षिपन्) सन्मुख लाता हुआ (रथीव) बहुत रथवाले के सदृश (वर्ष्यान्) वर्षाओं में श्रेष्ठ (दूतान्) दूतों को (आवि, कृणुते) प्रकट करता है (अह) परतन्त्र करने में वे (दूरात्) दूर से (सिंहस्य) सिंह के सदृश (उत्, ईरते) कम्पाते वा चलते हैं और पर्जन्य (वर्ष्यम्) वर्षाओं में हुए (नभः) अन्तरिक्ष को (कृणुते) करता अर्थात् प्रकट करता है, उसको आप (स्तनथाः) पुकारिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जैसे सारथी घोड़ों को यथेष्ट स्थान में ले जाने को समर्थ होता है, वैसे ही मेघ जलों को इधर-उधर ले जाता है ॥३॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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