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Rigveda Mandal 5 / Sukta 82 / Mantra 8

87 Sukta
9 Mantra
5/82/8
Devata- सविता Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य इ॒मे उ॒भे अह॑नी पु॒र एत्यप्र॑युच्छन्। स्वा॒धीर्दे॒वः स॑वि॒ता ॥८॥

यः । इ॒मे इति॑ । उ॒भे इति॑ । अह॑नी॒ इति॑ । पु॒रः । एति॑ । अप्र॑ऽयुच्छन् । सु॒ऽआ॒धीः । दे॒वः । स॒वि॒ता ॥

Mantra without Swara
य इमे उभे अहनी पुर एत्यप्रयुच्छन्। स्वाधीर्देवः सविता ॥

यः। इमे । उभे इति। अहनी इति। पुरः। एति। अप्रऽयुच्छन्। सुऽआधीः। देवः। सविता ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 26 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो (अप्रयुच्छन्) प्रमाद को नहीं करता हुआ मनुष्य जैसे (स्वाधीः) उत्तम प्रकार स्थापन किया जाता है जिससे वह (देवः) प्रकाशमान (सविता) श्रेष्ठ कर्म्मों में प्रेरणा करनेवाला सत्य में वर्त्तमान है, वैसे (इमे) इन (उभे) दोनों (अहनी) रात्रि और दिनों को सत्य से (पुरः) आगे (एति) प्राप्त होता है, वही भाग्यशाली होता है ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे परमेश्वर अपने नियमों की यथायोग्य रक्षा करता है, वैसे ही मनुष्य भी श्रेष्ठ नियमों की यथावत् रक्षा करें ॥८॥
Subject
फिर मनुष्य कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥