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Rigveda Mandal 5 / Sukta 81 / Mantra 2

87 Sukta
5 Mantra
5/81/2
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्वा॑ रू॒पाणि॒ प्रति॑ मुञ्चते क॒विः प्रासा॑वीद्भ॒द्रं द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे। वि नाक॑मख्यत्सवि॒ता वरे॒ण्योऽनु॑ प्र॒याण॑मु॒षसो॒ वि रा॑जति ॥२॥

विश्वा॑ । रू॒पाणि॑ । प्रति॑ । मु॒ञ्च॒ते॒ । क॒विः । प्र । अ॒सा॒वी॒त् । भ॒द्रम् । द्वि॒ऽपदे॑ । चतुः॑ऽपदे । वि । नाक॑म् । अ॒ख्य॒त् । स॒वि॒ता । वरे॑ण्यः । अनु॑ । प्र॒ऽयान॑म् । उ॒षसः॑ । वि । रा॒ज॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः प्रासावीद्भद्रं द्विपदे चतुष्पदे। वि नाकमख्यत्सविता वरेण्योऽनु प्रयाणमुषसो वि राजति ॥

विश्वा। रूपाणि। प्रति। मुञ्चते। कविः। प्र। असावीत्। भद्रम्। द्विऽपदे। चतुःऽपदे। वि। नाकम्। अख्यत्। सविता। वरेण्यः। अनु। प्रऽयानम्। उषसः। वि। राजति ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्य ! जो (कविः) सर्व पदार्थों का जाननेवाला सर्वज्ञ (वरेण्यः) स्वीकार करने योग्य और (सविता) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों का देनेवाला ईश्वर (द्विपदे) मनुष्य आदि और (चतुष्पदे) गौ आदि के लिये (भद्रम्) कल्याण को (प्र, असावीत्) उत्पन्न करता और (विश्वा) सम्पूर्ण (रूपाणि) सूर्य्य आदिकों का (प्रति, मुञ्चते) त्याग करता है तथा (नाकम्) नहीं विद्यमान दुःख जिसमें उसका (वि, अख्यत्) प्रकाश करता है, वह जैसे (उषसः) प्रातःकाल के (अनु, प्रयाणम्) पीछे गमन को सूर्य्य (वि, राजति) विशेष करके शोभित करता है, वैसे सूर्य्य आदि को प्रकाशित करता है, उसकी तुम सब उपासना करो ॥२॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस जगदीश्वर ने विचित्र और अनेक प्रकार के जगत् को सम्पूर्ण प्राणियों के सुख के लिये रचा, उसी जगदीश्वर की आप लोग उपासना करो ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥