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Rigveda Mandal 5 / Sukta 81 / Mantra 1

87 Sukta
5 Mantra
5/81/1
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यु॒ञ्जते॒ मन॑ उ॒त यु॑ञ्जते॒ धियो॒ विप्रा॒ विप्र॑स्य बृह॒तो वि॑प॒श्चितः॑। वि होत्रा॑ दधे वयुना॒विदेक॒ इन्म॒ही दे॒वस्य॑ सवि॒तुः परि॑ष्टुतिः ॥१॥

यु॒ञ्जते॑ । मनः॑ । उ॒त । यु॒ञ्जते॑ । धियः॑ । विप्राः॑ । विप्र॑स्य । बृ॒ह॒तः । वि॒पः॒ऽचितः॑ । वि । होत्राः॑ । द॒धे॒ । व॒यु॒न॒ऽवित् । एकः॑ । इत् । म॒ही । दे॒वस्य॑ । स॒वि॒तुः । परि॑ऽस्तुतिः ॥

Mantra without Swara
युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः। वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥

युञ्जते। मनः। उत। युञ्जते। धियः। विप्राः। विप्रस्य। बृहतः। विपःऽचितः। वि। होत्राः। दधे। वयुनऽवित्। एकः। इत्। मही। देवस्य। सवितुः। परिऽस्तुतिः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 24 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (होत्राः) लेने वा देनेवाले (विप्राः) बुद्धिमान् योगीजन (विप्रस्य) विशेष कर के व्याप्त होनेवाले (बृहतः) बड़े (विपश्चितः) अनन्त विद्यावान् (सवितुः) सम्पूर्ण जगत् के उत्पन्न करनेवाले (देवस्य) सम्पूर्ण जगत् के प्रकाशक परमात्मा के मध्य में (मनः) मननस्वरूप मन को (युञ्जते) युक्त करते (उत) और (धियः) बुद्धियों को (युञ्जते) युक्त करते हैं और जो (वयुनावित्) प्रज्ञानों को जाननेवाला (एकः) सहायरहित अकेला (इत्) ही संपूर्ण जगत् को (वि, दधे) रचता और जिसकी (मही) बड़ी आदर करने योग्य (परिष्टुतिः) सब और व्याप्त स्तुति है, वैसे उस में आप लोग भी चित्त को धारण करो ॥१॥
Essence
अनेक विद्याबृंहित, बुद्धि आदि पदार्थों के अधिष्ठान, जगदीश्वर के बीच जो मन और बुद्धि को निरन्तर स्थापन करते हैं, वे समस्त ऐहिक और पारलौकिक सुख को प्राप्त होते हैं ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले इक्यासीवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में योगीजन क्या करते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

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