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Rigveda Mandal 5 / Sukta 80 / Mantra 6

87 Sukta
6 Mantra
5/80/6
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒षा प्र॑ती॒ची दु॑हि॒ता दि॒वो नॄन्योषे॑व भ॒द्रा नि रि॑णीते॒ अप्सः॑। व्यू॒र्ण्व॒ती दा॒शुषे॒ वार्या॑णि॒ पुन॒र्ज्योति॑र्युव॒तिः पू॒र्वथा॑कः ॥६॥

ए॒षा । प्र॒ती॒ची । दु॒हि॒ता । दि॒वः । नॄन् । योषा॑ऽइव । भ॒द्रा । नि । रि॒णी॒ते॒ । अप्सः॑ । वि॒ऽऊ॒र्ण्व॒ती । दा॒शुषे॑ । वार्या॑णि । पुनः॑ । ज्योतिः॑ । यु॒व॒तिः । पू॒र्वऽथा॑ । अ॒क॒रित्य॑कः ॥

Mantra without Swara
एषा प्रतीची दुहिता दिवो नॄन्योषेव भद्रा नि रिणीते अप्सः। व्यूर्ण्वती दाशुषे वार्याणि पुनर्ज्योतिर्युवतिः पूर्वथाकः ॥

एषा। प्रतीची। दुहिता। दिवः। नॄन्। योषाऽइव। भद्रा। नि। रिणीते। अप्सः। विऽऊर्ण्वती। दाशुषे। वार्याणि। पुनः। ज्योतिः। युवतिः। पूर्वऽथा। अकरित्यकः ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 23 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे शुभ लक्षणोंवाली स्त्रि ! जैसे (एषा) यह प्रातर्वेला (दिवः) सूर्य्य की (दुहिता) कन्या के सदृश (नॄन्) अग्रणी श्रेष्ठ पुरुषों को (योषेव) स्त्री के सदृश (भद्रा) कल्याण करनेवाली (प्रतीची) पश्चिम दिशा को प्राप्त (अप्सः) सुन्दर रूप को (नि, रिणीते) अत्यन्त प्राप्त होती है और (दाशुषे) देनेवाले के लिये (वार्याणि) स्वीकार करने योग्य धन आदि को (व्यूर्ण्वती) विशेष करके आच्छादित करती हुई (पूर्वथा) पहिली के सदृश (पुनः) फिर (ज्योतिः) ज्योतिःरूप को (युवतिः) प्राप्त यौवनावस्थावाली के सदृश (अकः) करती है, वैसी तुम होओ ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो स्त्रियाँ शुभ आचरणवालीं और युवावस्था को प्राप्त हुईं अपने सदृश पतियों को प्राप्त होकर सम्पूर्ण गृहकृत्यों को व्यवस्थापित करती हैं, वे प्रातर्वेला के सदृश अत्यन्त शोभित होती हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥