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Rigveda Mandal 5 / Sukta 80 / Mantra 4

87 Sukta
6 Mantra
5/80/4
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒षा व्ये॑नी भवति द्वि॒बर्हा॑ आविष्कृण्वा॒ना त॒न्वं॑ पु॒रस्ता॑त्। ऋ॒तस्य॒ पन्था॒मन्वे॑ति सा॒धु प्र॑जान॒तीव॒ न दिशो॑ मिनाति ॥४॥

ए॒षा । विऽए॑नी । भ॒व॒ति॒ । द्वि॒ऽबर्हाः॑ । आ॒विः॒ऽकृ॒ण्वा॒ना । त॒न्व॑म् । पु॒रस्ता॑त् । ऋ॒तस्य॑ । पन्था॑म् । अनु॑ । ए॒ति॒ । सा॒धु । प्र॒ऽजा॒न॒तीऽइ॑व । न । दिशः॑ । मि॒ना॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
एषा व्येनी भवति द्विबर्हा आविष्कृण्वाना तन्वं पुरस्तात्। ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति ॥

एषा। विऽएनी। भवति। द्विऽबर्हाः। आविःऽकृण्वाना। तन्वम्। पुरस्तात्। ऋतस्य। पन्थाम्। अनु। एति। साधु। प्रजानतीऽइव। न। दिशः। मिनाति ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 23 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्यायुक्त स्त्रि ! जैसे (एषा) यह प्रातर्वेला (पुरस्तात्) प्रथम (तन्वम्) शरीर को (आविष्कृण्वाना) और संपूर्ण रूपवाले द्रव्यों की प्रकटता करती हुई (द्विबर्हाः) दिन और रात्रि से बढ़ानेवाली (व्येनी) विशेष हरिणी के सदृश वेगयुक्त (भवति) होती है और (ऋतस्य) सत्य के (पन्थाम्) मार्ग की (अनु, एति) अनुगामिनी होती है और (साधु) उत्तम विज्ञान को (प्रजानतीव) विशेष करके जानती हुई सी (दिशः) दिशाओं का (न) नहीं (मिनाति) नाश करती है, वैसा तू वर्त्ताव कर ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सती स्त्री गृहाश्रम के मार्ग को प्रकाशित करके सम्पूर्ण सुखों को प्रकट करती है, वैसे ही प्रातर्वेला वर्त्तमान है ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥