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Rigveda Mandal 5 / Sukta 80 / Mantra 3

87 Sukta
6 Mantra
5/80/3
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒षा गोभि॑ररु॒णेभि॑र्युजा॒नास्रे॑धन्ती र॒यिमप्रा॑यु चक्रे। प॒थो रद॑न्ती सुवि॒ताय॑ दे॒वी पु॑रुष्टु॒ता वि॒श्ववा॑रा॒ वि भा॑ति ॥३॥

एषा । गोभिः॑ । अ॒रु॒णेभिः॑ । यु॒जा॒ना । अस्रे॑धन्ती । र॒यिम् । अप्र॑ऽआयु । च॒क्रे॒ । प॒थः । रद॑न्ती । सु॒वि॒ताय॑ । पु॒रु॒ऽस्तु॒ता । वि॒श्वऽवा॑रा । वि । भा॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
एषा गोभिररुणेभिर्युजानास्रेधन्ती रयिमप्रायु चक्रे। पथो रदन्ती सुविताय देवी पुरुष्टुता विश्ववारा वि भाति ॥

एषा। गोभिः। अरुणेभिः। युजाना। अस्रेधन्ती। रयिम्। अप्रऽआयु। चक्रे। पथः। रदन्ती। सुविताय। देवी। पुरुऽस्तुता। विश्वऽवारा। वि। भाति ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 23 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्यायुक्त स्त्रि ! जैसे (एषा) यह प्रातर्वेला (अरुणेभिः) चारों ओर रक्त वर्णवाले (गोभिः) किरणों के साथ (युजाना) युक्त और (रयिम्) धन को (अस्रेधन्ती) सिद्ध करती हुई (अप्रायु) नहीं नष्ट होनेवाले को (चक्रे) करती है और (पथः) मार्गों को (रदन्ती) खोदती हुई (पुरुष्टुता) बहुतों से प्रशंसा की गई (विश्ववारा) सम्पूर्ण मनुष्यों से स्वीकार करने योग्य (देवी) प्रकाशित होती हुई (सुविताय) ऐश्वर्य्य के लिये (वि, भाति) विशेष करके प्रकाशित होती है, वैसे आप होओ ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता, विद्यायुक्त और चतुर स्त्री गृह को प्रकाशित करनेवाली होती है, वैसे ही प्रातर्वेला ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करनेवाली है ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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