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Rigveda Mandal 5 / Sukta 80 / Mantra 2

87 Sukta
6 Mantra
5/80/2
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhanda- स्वराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ए॒षा जनं॑ दर्श॒ता बो॒धय॑न्ती सु॒गान्प॒थः कृ॑ण्व॒ती या॒त्यग्रे॑। बृ॒ह॒द्र॒था बृ॑ह॒ती वि॑श्वमि॒न्वोषा ज्योति॑र्यच्छ॒त्यग्रे॒ अह्ना॑म् ॥२॥

ए॒षा । जन॑म् । द॒र्श॒ता । बो॒धय॑न्ती । सु॒ऽमान् । प॒थः । कृ॒ण्व॒ती । या॒ति॒ । अग्रे॑ । बृ॒ह॒त्ऽर॒था । बृ॒ह॒ती । वि॒श्व॒म्ऽइ॒न्वा । उ॒षाः । ज्योतिः॑ । य॒च्छ॒ति॒ । अग्रे॑ । अह्ना॑म् ॥

Mantra without Swara
एषा जनं दर्शता बोधयन्ती सुगान्पथः कृण्वती यात्यग्रे। बृहद्रथा बृहती विश्वमिन्वोषा ज्योतिर्यच्छत्यग्रे अह्नाम् ॥

एषा। जनम्। दर्शता। बोधयन्ती। सुऽगान्। पथः। कृण्वती। याति। अग्रे। बृहत्ऽरथा। बृहती। विश्वम्ऽइन्वा। उषाः। ज्योतिः। यच्छति। अग्रे। अह्नाम् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 23 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे उत्तम स्वभाववाली स्त्रियो ! जैसे (एषा) यह (बृहद्रथा) बड़े रथ जिसके ऐसी (बृहती) बड़ी (विश्वमिन्वा) संपूर्ण जगत् को प्रक्षेप करती अलग करती और (जनम्) मनुष्य को और (दर्शता) देखने योग्य भूमियों को (बोधयन्ती) जनाती हुई (सुगान्) सुखपूर्वक जिनमें चलें उन (पथः) मार्गों को (कृण्वती) प्रकाशित करती हुई (उषाः) प्रातर्वेला (अग्रे) दिन से आगे (याति) चलती है और (अह्नाम्) दिनों के (अग्रे) पहिले से (ज्योतिः) प्रकाश को (यच्छति) देती है, वैसे तुम होओ ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो स्त्रियाँ प्रभातवेला के सदृश अपने पति आदि को सूर्य्योदय से पहिले जगातीं, गृह और बाहर के मार्गों को साफ करतीं, आते हुए पतियों के हाथ जोड़ के आगे खड़ी होतीं और सब काल में विज्ञान को देती हैं, वे ही देश और कुल को शोभन करनेवाली हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥