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Rigveda Mandal 5 / Sukta 80 / Mantra 1

87 Sukta
6 Mantra
5/80/1
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
द्यु॒तद्या॑मानं बृह॒तीमृ॒तेन॑ ऋ॒ताव॑रीमरु॒णप्सुं॑ विभा॒तीम्। दे॒वीमु॒षसं॒ स्व॑रा॒वह॑न्तीं॒ प्रति॒ विप्रा॑सो म॒तिभि॑र्जरन्ते ॥१॥

द्यु॒तऽद्या॑मानम् । बृ॒ह॒तीम् । ऋ॒तेन॑ । ऋ॒तऽव॑रीम् । अ॒रु॒णऽप्सु॑म् । वि॒ऽभा॒तीम् । दे॒वीम् । उ॒षस॑म् । स्वः॑ । आ॒ऽवह॑न्तीम् । प्रति॑ । विप्रा॑सः । म॒तिऽभिः॑ । ज॒र॒न्ते॒ ॥

Mantra without Swara
द्युतद्यामानं बृहतीमृतेन ऋतावरीमरुणप्सुं विभातीम्। देवीमुषसं स्वरावहन्तीं प्रति विप्रासो मतिभिर्जरन्ते ॥

द्युतत्ऽयामानम्। बृहतीम्। ऋतेन। ऋतऽवरीम्। अरुणऽप्सुम्। विऽभातीम्। देवीम्। उषसम्। स्वः। आऽवहन्तीम्। प्रति। विप्रासः। मतिऽभिः। जरन्ते ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 23 Mantra » 1

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Meaning
हे स्त्रि ! जैसे (विप्रासः) बुद्धिमान् जन (मतिभिः) बुद्धियों से और (ऋतेन) जल के सदृश सत्य से (द्युतद्यामानम्) प्रहरों को प्रकाश करती और (बृहतीम्) बढ़ती हुई (ऋतावरीम्) बहुत सत्य आचरण से युक्त (अरुणप्सुम्) लालरूपवाली (विभातीम्) प्रकाश करती हुई (देवीम्) प्रकाशमान और (स्वः) सूर्य्य के सदृश विद्या के प्रकाश को (आवहन्तीम्) धारण करती हुई (उषसम्) उषर्वेला की (प्रति) उत्तम प्रकार (जरन्ते) स्तुति करते हैं, उनकी तू प्रशंसा कर ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बुद्धिमान् पति उषःकाल आदि पदार्थों की विद्या को जान कर क्षणभर भी काल व्यर्थ नहीं व्यतीत करते हैं, वैसे ही स्त्रियाँ भी व्यर्थ समय न व्यतीत करें ॥१॥
Subject
अब छः ऋचावाले अस्सीवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में स्त्रियों के गुणों को कहते हैं ॥

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