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Rigveda Mandal 5 / Sukta 8 / Mantra 2

87 Sukta
7 Mantra
5/8/2
Devata- अग्निः Rishi- इष आत्रेयः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वाम॑ग्ने॒ अति॑थिं पू॒र्व्यं विशः॑ शो॒चिष्के॑शं गृ॒हप॑तिं॒ नि षे॑दिरे। बृ॒हत्के॑तुं पुरु॒रूपं॑ धन॒स्पृतं॑ सु॒शर्मा॑णं॒ स्वव॑सं जर॒द्विष॑म् ॥२॥

त्वाम् । अ॒ग्ने॒ । अति॑थिम् । पू॒र्व्यम् । विशः॑ । शो॒चिःऽके॑शम् । गृ॒हऽप॑तिम् । नि । से॒दि॒रे॒ । बृ॒हत्ऽके॑तुम् । पु॒रु॒ऽरूप॑म् । ध॒न॒ऽस्पृत॑म् । सु॒ऽशर्मा॑णम् । सु॒ऽअव॑सम् । ज॒र॒त्ऽविष॑म् ॥

Mantra without Swara
त्वामग्ने अतिथिं पूर्व्यं विशः शोचिष्केशं गृहपतिं नि षेदिरे। बृहत्केतुं पुरुरूपं धनस्पृतं सुशर्माणं स्ववसं जरद्विषम् ॥

त्वाम्। अग्ने। अतिथिम्। पूर्व्यम्। विशः। शोचिःऽकेशम्। गृहऽपतिम्। नि। सेदिरे। बृहत्ऽकेतुम्। पुरुऽरूपम्। धनऽस्पृतम्। सुऽशर्माणम्। सुऽअवसम्। जरत्ऽविषम् ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 26 Mantra » 2

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Meaning
हे (अग्ने) गृहस्थ जो (विशः) प्रजायें (अतिथिम्) सदा उपदेश देने के लिये घूमते हुए के सदृश वर्त्तमान (पूर्व्यम्) प्राचीनों से किये गये विद्वान् और (शोचिष्केशम्) केशों के सदृश न्यायव्यवहार के प्रकाशों से युक्त (बृहत्केतुम्) बड़ी बुद्धिवाले (पुरुरूपम्) बहुत रूपों से युक्त सुन्दर आकृतिमान् (धनस्पृतम्) धन की इच्छा से युक्त (सुशर्म्माणम्) प्रशंसित गृहवाले (स्ववसम्) श्रेष्ठ रक्षण आदि जिनके (जरद्विषम्) वा निवृत्त हुआ शत्रुरूपी विष जिनका ऐसे (गृहपतिम्) गृहव्यवहार के पालन करनेवाले (त्वाम्) आप को (नि, षेदिरे) स्थित करते हैं, उनका आप निरन्तर सत्कार करें ॥२॥
Essence
गृहस्थ जन सदा ही प्रजा का पालन, अतिथि की सेवा, उत्तम गृह तथा विद्या का प्रचार, बुद्धि की वृद्धि, सब प्रकार से रक्षा तथा राग और द्वेष का त्याग निरन्तर करें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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