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Rigveda Mandal 5 / Sukta 79 / Mantra 6

87 Sukta
10 Mantra
5/79/6
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऐषु॑ धा वी॒रव॒द्यश॒ उषो॑ मघोनि सू॒रिषु॑। ये नो॒ राधां॒स्यह्र॑या म॒घवा॑नो॒ अरा॑सत॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते ॥६॥

आ । ए॒षु॒ । धाः॒ । वी॒रऽव॑त् । यशः॑ । उषः॑ । म॒घो॒नि॒ । सू॒रिषु॑ । ये । नः॒ । राधां॑सि । अह्र॑या । म॒घऽवा॑नः । अरा॑सत । सुऽजा॑ते । अश्व॑ऽसूनृते ॥

Mantra without Swara
ऐषु धा वीरवद्यश उषो मघोनि सूरिषु। ये नो राधांस्यह्रया मघवानो अरासत सुजाते अश्वसूनृते ॥

आ। एषु। धाः। वीरऽवत्। यशः। उषः। मघोनि। सूरिषु। ये। नः। राधांसि। अह्रया। मघऽवानः। अरासत। सुऽजाते। अश्वऽसूनृते ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 22 Mantra » 1

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Meaning
हे (अश्वसूनृते) बड़े ज्ञानवाली (सुजाते) उत्तम विद्या से प्रकट हुई (मघोनि) प्रशंसित धन से युक्त और (उषः) प्रातःकाल के सदृश वर्त्तमान उत्तम स्त्री ! तू (एषु) इन स्त्री-पुरुषों और (सूरिषु) विद्वानों में (वीरवत्) वीरजन विद्यमान जिसमें उस (यशः) यश को (आ) सब प्रकार से (धाः) धारण कर और (ये) जो (मघवानः) बहुत धनों से युक्त जन (नः) हम लोगों को (अह्रया) विना लज्जा से कहे गये (राधांसि) अन्नों को (अरासत) देवें, उनका तू सत्कार कर ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही प्रशंसित स्त्री है जो पिता और पति के कुल में श्रेष्ठ आचरण से पिता और पति के कुल को प्रकाशित करे ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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