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Rigveda Mandal 5 / Sukta 78 / Mantra 6

87 Sukta
9 Mantra
5/78/6
Devata- अश्विनौ Rishi- सप्तवध्रिरात्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भी॒ताय॒ नाध॑मानाय॒ ऋष॑ये स॒प्तव॑ध्रये। मा॒याभि॑रश्विना यु॒वं वृ॒क्षं सं च॒ वि चा॑चथः ॥६॥

भी॒ताय॑ । नाध॑मानाय । ऋष॑ये । स॒प्तऽव॑ध्रये । मा॒याभिः॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । यु॒वम् । वृ॒क्षम् । सम् । च॒ । वि । च॒ । अ॒च॒थः॒ ॥

Mantra without Swara
भीताय नाधमानाय ऋषये सप्तवध्रये। मायाभिरश्विना युवं वृक्षं सं च वि चाचथः ॥

भीताय। नाधमानाय। ऋषये। सप्तऽवध्रये। मायाभिः। अश्विना। युवम्। वृक्षम्। सम्। च। वि। च। अचथः ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) अध्यापक और उपदेशकजनो ! (युवम्) आप दोनों (मायाभिः) बुद्धियों से (भीताय) भय को प्राप्त (नाधमानाय) उपतप्यमान और (सप्तवध्रये) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मन और बुद्धि ये सात नष्ट हुईं जिसकी अर्थात् इनकी प्रबलता से रहित उसके लिये और (ऋषये) वेदार्थ के जाननेवाले के लिये (च) भी (सम्, अचथः) उत्तम प्रकार जाइये (वृक्षम्, च) और जो काटा जाता उस वृक्ष को (वि) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये ॥६॥
Essence
विद्वानों की योग्यता है कि बुद्धि के देने से अविद्यादि भय के कारण डरे हुओं को भयरहित करके तथा संसार में मोह और अधर्म्म के योग से वियुक्त करके सुखी करें ॥६॥
Subject
इसके अनन्तर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥