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Rigveda Mandal 5 / Sukta 77 / Mantra 3

87 Sukta
5 Mantra
5/77/3
Devata- अश्विनौ Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यत्व॒ङ्मधु॑वर्णो घृ॒तस्नुः॒ पृक्षो॒ वह॒न्ना रथो॑ वर्तते वाम्। मनो॑जवा अश्विना॒ वात॑रंहा॒ येना॑तिया॒थो दु॑रि॒तानि॒ विश्वा॑ ॥३॥

हिर॑ण्यऽत्वक् । मधु॑ऽवर्णः । घृ॒तऽस्नुः । पृक्षः॑ । वह॑न् । आ । रथः॑ । व॒र्त॒ते॒ । वा॒म् । मनः॑ऽजवाः । अ॒श्वि॒ना॒ । वात॑ऽरंहाः । येन॑ । अ॒ति॒ऽया॒थः । दुः॒ऽरि॒तानि॑ । विश्वा॑ ॥

Mantra without Swara
हिरण्यत्वङ्मधुवर्णो घृतस्नुः पृक्षो वहन्ना रथो वर्तते वाम्। मनोजवा अश्विना वातरंहा येनातियाथो दुरितानि विश्वा ॥

हिरण्यऽत्वक्। मधुऽवर्णः। घृतऽस्नुः। पृक्षः। वहन्। आ। रथः। वर्तते। वाम्। मनःऽजवाः। अश्विना। वातऽरंहाः। येन। अतिऽयाथः। दुःऽइतानि। विश्वा ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) शिल्पविद्या के जाननेवालो ! (वाम्) आप दोनों का (हिरण्यत्वक्) तेज और सुवर्ण के सदृश त्वचा पर का वर्ण और (मधुवर्णः) देखने योग्य वर्ण जिसका वह (घृतस्नुः) जल को शुद्ध करनेवाला (पृक्षः) अन्न आदि को (वहन्) प्राप्त होता वा प्राप्त कराता हुआ (रथः) विमान आदि वाहन को (आ, वर्त्तते) सब प्रकार वर्त्तमान है और जिसको (मनोजवाः) मन के सदृश वेगवाले (वातरंहाः) वायु के सदृश वेगयुक्त अग्नि आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं और (येन) जिस रथ से (विश्वा) सम्पूर्ण (दुरितानि) दुःख से प्राप्त होने योग्य स्थानान्तरों को (अतियाथः) अत्यन्त प्राप्त होते हैं, उसको आप दोनों रचिये ॥३॥
Essence
जो मनुष्य विमानादिकों को अग्नि और जलादिकों से चलावें तो वे विमान आदि मन और वायु के सदृश शीघ्र जा कर लौट आवें ॥३॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥