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Rigveda Mandal 5 / Sukta 77 / Mantra 1

87 Sukta
5 Mantra
5/77/1
Devata- अश्विनौ Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्रा॒त॒र्यावा॑णा प्रथ॒मा य॑जध्वं पु॒रा गृध्रा॒दर॑रुषः पिबातः। प्रा॒तर्हि य॒ज्ञम॒श्विना॑ द॒धाते॒ प्र शं॑सन्ति क॒वयः॑ पूर्व॒भाजः॑ ॥१॥

प्रा॒तः॒ऽयावा॑ना । प्र॒थ॒मा । य॒ज॒ध्व॒म् । पु॒रा । गृध्रा॑त् । अर॑रुषः । पि॒बा॒तः॒ । प्रा॒तः । हि । य॒ज्ञम् । अ॒श्विना॑ । द॒धाते॒ इति॑ । प्र । शं॒स॒न्ति॒ । क॒वयः॑ । पू॒र्व॒ऽभाजः॑ ॥

Mantra without Swara
प्रातर्यावाणा प्रथमा यजध्वं पुरा गृध्रादररुषः पिबातः। प्रातर्हि यज्ञमश्विना दधाते प्र शंसन्ति कवयः पूर्वभाजः ॥

प्रातःऽयावाना। प्रथमा। यजध्वम्। पुरा। गृध्रात्। अररुषः। पिबातः। प्रातः। हि। यज्ञम्। अश्विना। दधाते इति। प्र। शंसन्ति। कवयः। पूर्वऽआजः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! तुम जैसे (पुरा) पहिले (प्रातर्यावाणा) जो सूर्य्य और उषा प्रातर्वेला में चलते हैं उन (प्रथमा) प्रथम और विस्तीर्ण स्वरूपवालों को और (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनों को (यजध्वम्) मिलाओ और (अररुषः) नहीं देनेवाले की (गृध्रात्) अभिकाङ्क्षा से रस को (पिबातः) पीते और (प्रातः हि) प्रातःकाल ही (यज्ञम्) राज्यपालन को (दधाते) धारण करते हैं उनकी (पूर्वभाजः) पूर्वजनों के आदर करनेवाले (कवयः) बुद्धिमान् जन (प्र, शंसन्ति) प्रशंसा करते हैं, वैसे उनको आप लोग जानो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो राजा और उपदेशक जन दिन में शयनरहित और जिनकी विद्वान् जन स्तुति करते हैं, उनके सत्सङ्ग से आप लोग काङ्क्षासिद्धि करो ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले सतहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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