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Rigveda Mandal 5 / Sukta 76 / Mantra 2

87 Sukta
5 Mantra
5/76/2
Devata- अश्विनौ Rishi- अमहीयुः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न सं॑स्कृ॒तं प्र मि॑मीतो॒ गमि॒ष्ठान्ति॑ नू॒नम॒श्विनोप॑स्तुते॒ह। दिवा॑भिपि॒त्वेऽव॒साग॑मिष्ठा॒ प्रत्यव॑र्तिं दा॒शुषे॒ शंभ॑विष्ठा ॥२॥

न । सं॒स्कृ॒तम् । प्र । मि॒मी॒तः॒ । गमि॑ष्ठा । अन्ति॑ । नू॒नम् । अ॒श्विना॑ । उप॑ऽस्तुता । इ॒ह । दि॒वा॑ । अ॒भि॒ऽपि॒त्वे । अव॑सा । आऽग॑मिष्ठा । प्रति॑ । अव॑र्तिम् । दा॒शुषे॑ । शम्ऽभ॑विष्ठा ॥

Mantra without Swara
न संस्कृतं प्र मिमीतो गमिष्ठान्ति नूनमश्विनोपस्तुतेह। दिवाभिपित्वेऽवसागमिष्ठा प्रत्यवर्तिं दाशुषे शंभविष्ठा ॥

न। संस्कृतम्। प्र। मिमीतः। गमिष्ठा। अन्ति। नूनम्। अश्विना। उपऽस्तुता। इह। दिवा। अभिऽपित्वे। अवसा। आऽगमिष्ठा। प्रति। अवर्त्तिम्। दाशुषे। शम्ऽभविष्ठा ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 17 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (गमिष्ठा) अतिशय चलनेवाले (शम्भविष्ठा) अतिशय सुखकारक और (नूनम्) निश्चित (उपस्तुता) प्राप्त हुई प्रशंसा से कीर्त्ति को पाये हुए (अश्विना) स्त्रीपुरुषो ! आप (इह) इस संसार में (संस्कृतम्) किया संस्कार जिसका उसको (न) नहीं (प्र, मिमीतः) उत्पन्न करते हो और (अभिपित्वे) सब ओर से प्राप्त होने पर (अवसा) रक्षण आदि से (अवर्त्तिम्) अमार्ग के (प्रति) प्रतिकूल उत्पन्न करते हो और (दाशुषे) दान करनेवाले के लिये (दिवा) दिवस से (अन्ति) समीप में (आगमिष्ठा) चारों और अतिशय चलनेवाले होओ ॥२॥
Essence
जो गृहस्थ जन-किया है संस्कार जिनका, ऐसे पदार्थों का वृथा नहीं नाश करते हैं, वे लक्ष्मीवान् होते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥